Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 836

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- कविर्भार्गवः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
तं꣡ त्वा꣢ नृ꣣म्णा꣢नि꣣ बि꣡भ्र꣢तꣳ स꣣ध꣡स्थे꣢षु म꣣हो꣢ दि꣣वः꣢ । चा꣡रु꣢ꣳ सुकृ꣣त्य꣡ये꣢महे ॥८३६॥

त꣢म् । त्वा꣣ । नृम्णा꣡नि꣢ । बि꣡भ्र꣢꣯तम् । स꣣ध꣡स्थे꣢षु । स꣣ध꣡ । स्थे꣣षु । महः꣢ । दि꣣वः꣢ । चा꣡रु꣢꣯म् । सु꣣कृत्य꣡या꣢ । सु꣣ । कृत्य꣡या꣢ । ई꣣महे ॥८३६॥

Mantra without Swara
तं त्वा नृम्णानि बिभ्रतꣳ सधस्थेषु महो दिवः । चारुꣳ सुकृत्ययेमहे ॥

तम् । त्वा । नृम्णानि । बिभ्रतम् । सधस्थेषु । सध । स्थेषु । महः । दिवः । चारुम् । सुकृत्यया । सु । कृत्यया । ईमहे ॥८३६॥

Samveda - Mantra Number : 836
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 1;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे सोम अर्थात् जगत्स्रष्टा परमात्मन् ! (महः दिवः) महान् आकाश के (सधस्थेषु) सूर्य, ग्रह, नक्षत्र, चन्द्र आदि लोकों में, अथवा (महः दिवः) महान् प्रकाशमय जीवात्मा के (लोकेषु) मन, बुद्धि, प्राण, इन्द्रिय आदि लोकों में (नृम्णानि) धन और बल (बिभ्रतम्) स्थापित करनेवाले, (चारुम्) रमणीय (तं त्वा) उस सुप्रसिद्ध तुझको हम (सुकृत्यया) पुण्य कर्म से (ईमहे) प्राप्त करते हैं ॥१॥
Essence
भूगोल, खगोल, और शरीर में सर्वत्र धन और बल को उत्पन्न करनेवाला परमेश्वर शुभ कर्मों से ही पाया जा सकता है, अशुभों से नहीं ॥१॥
Subject
प्रथम मन्त्र में परमात्मा की कामना की गयी है।