Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 833

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- भृगुर्वारुणिर्जमदग्निर्भार्गवो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
रा꣡जा꣢ मे꣣धा꣡भि꣢रीयते꣣ प꣡व꣢मानो म꣣ना꣡वधि꣢꣯ । अ꣣न्त꣡रि꣢क्षेण꣣ या꣡त꣢वे ॥८३३॥

रा꣡जा꣢꣯ । मे꣣धा꣡भिः꣢ । ई꣣यते । प꣡व꣢꣯मानः । म꣡नौ꣢ । अ꣡धि꣢꣯ । अ꣣न्त꣡रि꣢क्षेण । या꣡त꣢꣯वे ॥८३३॥

Mantra without Swara
राजा मेधाभिरीयते पवमानो मनावधि । अन्तरिक्षेण यातवे ॥

राजा । मेधाभिः । ईयते । पवमानः । मनौ । अधि । अन्तरिक्षेण । यातवे ॥८३३॥

Samveda - Mantra Number : 833
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 1;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रथम—परमेश्वर के पक्ष में। (राजा) विश्वब्रह्माण्ड का सम्राट्, (पवमानः) पवित्रतादायक सोम परमेश्वर (मनौ अधि) मननशील उपासक के अन्तःकरण में (मेधाभिः) धारणावती बुद्धियों के साथ (ईयते) पहुँचता है। वही मङ्गल, बुध, बृहस्पति, पृथिवी, चन्द्र आदि ग्रहोपग्रहों को तथा पक्षी आदियों को (अन्तरिक्षेण) आकाश मार्ग से (यातवे) गति करने के लिए समर्थ करता है ॥ द्वितीय—राजा के पक्ष में। (राजा) राष्ट्र का सम्राट् (पवमानः) राष्ट्रवासियों के आचरण में पवित्रता उत्पन्न करता हुआ (मनौ अधि) विद्वान् प्रजावर्ग के मध्य में (मेधाभिः) शिल्पियों के बुद्धिकौशलों से (अन्तरिक्षेण यातवे) विमानों द्वारा आकाशमार्ग से यात्रा करने के लिए (ईयते) समर्थ होता है॥ तृतीय—योगी के पक्ष में। (राजा) योगिराज (पवमानः) अपने अन्तःकरण व व्यवहार को पवित्र करता हुआ (अन्तरिक्षेण यातवे) अन्तरिक्ष से जाने के लिए अर्थात् आकाशगमन की सिद्धि प्राप्त करने के लिए (मेधाभिः) ध्यानों के द्वारा (मनौ अधि) मननशील अपनी अन्तरात्मा में तथा सर्वज्ञ परमात्मा में (ईयते) पहुँचता है, अर्थात् मन को अपने अन्तरात्मा में और परमात्मा में केन्द्रित करता है ॥ चतुर्थ—चन्द्रमा के पक्ष में। (राजा) देदीप्यमान चन्द्ररूप सोम (पवमानः) अपनी चाँदनी से भूमण्डल को पवित्र करता हुआ (मनौ अधि) दीप्तिमान् सूर्य के अधिष्ठातृत्व में (मेधाभिः) आकर्षण द्वारा सूर्य के साथ सङ्गम करके (अन्तरिक्षेण यातवे) आकाशमार्ग से भूमि और सूर्य की परिक्रमा करने के लिए (ईयते) प्रवृत्त होता है ॥१॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥१॥
Essence
जैसे पक्षी और ग्रह-उपग्रह आकाश में भ्रमण करते हैं और मनुष्य विमानों के द्वारा आकाश में यात्रा करते हैं, वैसे ही योगसिद्धि से योगी लोग भी आकाश में भ्रमण कर सकते हैं ॥१॥३
Subject
प्रथम ऋचा परमेश्वर, राजा, योगी व चन्द्रमा के विषय में है।