Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 825

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- श्रुतकक्षः सुकक्षो वा आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ए꣣वा꣢ रा꣣ति꣡स्तु꣢विमघ꣣ वि꣡श्वे꣢भिर्धायि धा꣣तृ꣡भिः꣢ । अ꣡धा꣢ चिदिन्द्र नः꣣ स꣡चा꣢ ॥८२५॥

ए꣣व꣢ । रा꣣तिः꣢ । तु꣣विमघ । तुवि । मघ । वि꣡श्वे꣢꣯भिः । धा꣣यि । धातृ꣡भिः꣢ । अ꣡ध꣢꣯ । चि꣣त् । इन्द्र । नः । स꣡चा꣢꣯ ॥८२५॥

Mantra without Swara
एवा रातिस्तुविमघ विश्वेभिर्धायि धातृभिः । अधा चिदिन्द्र नः सचा ॥

एव । रातिः । तुविमघ । तुवि । मघ । विश्वेभिः । धायि । धातृभिः । अध । चित् । इन्द्र । नः । सचा ॥८२५॥

Samveda - Mantra Number : 825
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 6;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (तुविमघ) बहुत धनी परमेश ! (एव) सचमुच, तेरा (रातिः) दान (विश्वेभिः) सब (धातृभिः) धारकों के द्वारा (धायि) धारण किया हुआ है। (अध चित्) इसके अतिरिक्त, हे (इन्द्र) परमैश्वर्यवन् विपत्तिविदारक परमात्मन् ! तू (नः) हमारा (सचा) नित्य का साथी है ॥२॥
Essence
जगदीश्वर यदि हमारा सखा हो जाता है तो हमारे लिए कुछ भी दुर्लभ नहीं रहता ॥२॥
Subject
इस प्रकार अपने आत्मा को उद्बोधन देकर अब परमात्मा को कहते हैं।