Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 820

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- नहुषो मानवः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
य꣡ ओजि꣢꣯ष्ठ꣣स्त꣡मा भ꣢꣯र꣣ प꣡व꣢मान श्र꣣वा꣡य्य꣢म् । यः꣡ पञ्च꣢꣯ चर्ष꣣णी꣢र꣣भि꣢ र꣣यिं꣢꣫ येन꣣ व꣡ना꣢महे ॥८२०॥

यः । ओ꣡जि꣢꣯ष्ठः । तम् । आ । भ꣣र । प꣡व꣢꣯मान । श्र꣣वा꣡य्य꣢म् । यः । प꣡ञ्च꣢꣯ । च꣣र्षणीः꣢ । अ꣣भि꣢ । र꣣यि꣢म् । ये꣡न꣢꣯ । व꣡ना꣢꣯महे ॥८२०॥

Mantra without Swara
य ओजिष्ठस्तमा भर पवमान श्रवाय्यम् । यः पञ्च चर्षणीरभि रयिं येन वनामहे ॥

यः । ओजिष्ठः । तम् । आ । भर । पवमान । श्रवाय्यम् । यः । पञ्च । चर्षणीः । अभि । रयिम् । येन । वनामहे ॥८२०॥

Samveda - Mantra Number : 820
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 5;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (पवमान) पवित्रकर्त्ता परमात्मन् वा आचार्य (यः) जो आपका (ओजिष्ठः) अतिशय ओजस्वी आनन्दरस वा ज्ञानरस है, (तम्) उस (श्रवाय्यम्) यश के हेतु रस को (आ भर) प्रदान कीजिए, (यः) जो आनन्द-रस या ज्ञान-रस (पञ्च चर्षणीः) पाँच ज्ञान की साधन इन्द्रियों को या पाँच प्राणों को (अभि) अभिव्याप्त कर लेवे और (येन) जिस आनन्द-रस वा ज्ञान-रस से, हम (रयिम्) भौतिक और आध्यात्मिक धन को (वनामहे) प्राप्त करें ॥३॥
Essence
जैसे परमात्मा अपने उपासक को ऐसा आनन्द प्रदान करता है, जिससे वह दिव्य सम्पत्ति पा लेता है, वैसे ही गुरुओं को चाहिए कि वे विद्यार्थियों को वैसा ज्ञान देवें जिससे धन कमाना सुलभ हो ॥३॥
Subject
अगले मन्त्र में परमात्मा और आचार्य को कहा जा रहा है।