Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 810

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- शंयुर्बार्हस्पत्यः Chhand- प्रगाथः(विषमा बृहती, समा सतोबृहती) Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
स꣡ त्वं न꣢꣯श्चित्र वज्रहस्त धृष्णु꣣या꣢ म꣣ह꣡ स्त꣢वा꣣नो꣡ अ꣢द्रिवः । गा꣡मश्व꣢꣯ꣳ र꣣꣬थ्य꣢꣯मिन्द्र꣣ सं꣡ कि꣢र स꣣त्रा꣢꣫ वाजं꣣ न꣢ जि꣣ग्यु꣡षे꣢ ॥८१०॥

सः꣢ । त्वम् । नः꣣ । चित्र । वज्रहस्त । वज्र । हस्त । धृष्णुया꣢ । म꣣हः꣢ । स्त꣣वानः꣢ । अ꣣द्रिवः । अ । द्रिवः । गा꣢म् । अ꣡श्व꣢꣯म् । र꣣थ्य꣢म् । इ꣣न्द्र । स꣢म् । कि꣣र । सत्रा꣢ । वा꣡ज꣢꣯म् । न । जि꣣ग्यु꣡षे꣢ ॥८१०॥

Mantra without Swara
स त्वं नश्चित्र वज्रहस्त धृष्णुया मह स्तवानो अद्रिवः । गामश्वꣳ रथ्यमिन्द्र सं किर सत्रा वाजं न जिग्युषे ॥

सः । त्वम् । नः । चित्र । वज्रहस्त । वज्र । हस्त । धृष्णुया । महः । स्तवानः । अद्रिवः । अ । द्रिवः । गाम् । अश्वम् । रथ्यम् । इन्द्र । सम् । किर । सत्रा । वाजम् । न । जिग्युषे ॥८१०॥

Samveda - Mantra Number : 810
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 4;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (चित्र) अद्भुत गुण, कर्म, स्वभाववाले, (वज्रहस्त) दण्डसामर्थ्ययुक्त अथवा शस्त्रास्त्र हाथ में धारण करनेवाले, (अद्रिवः) शत्रुओं से विदारण न किये जा सकनेवाले (इन्द्र) परमैश्वर्यवान् परमात्मन् वा जीवात्मन् ! (स्तवानः) स्तुति या गुण-वर्णन किया जाता हुआ, (धृष्णुया) धर्षक बल से (महः) महान् (सः) वह प्रसिद्ध (त्वम्) तू (नः) हमें (रथ्यम्) शरीर-रथ के वाहक (गाम्) प्राण-बल को तथा (अश्वम्) इन्द्रिय-बल को (संकिर) प्रदान कर, (न) जैसे (जिग्युषे) संग्राम को जीत लेनेवाले योद्धाजन को (सत्रा) सदा (वाजम्) अन्न, धन आदि का पुरस्कार राजा आदि प्रदान करते हैं ॥२॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है ॥२॥
Essence
आध्यात्मिक विजय के लिए और बाह्य विजय के लिए भी आत्मोद्बोधन के साथ परमात्मा की भी सहायता अपेक्षित होती है ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में पुनः परमात्मा और जीवात्मा को सम्बोधन है।