Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 772

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अग्निश्चाक्षुषः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
अ꣣या꣡ प꣢वस्व देव꣣यू꣡ रेभ꣢꣯न्प꣣वि꣢त्रं꣣ प꣡र्ये꣢षि वि꣣श्व꣡तः꣢ । म꣢धो꣣र्धा꣡रा꣢ असृक्षत ॥७७२॥

अ꣣या꣢ । प꣣वस्व । देवयुः꣢ । रे꣡भ꣢꣯न् । प꣣वि꣡त्र꣢म् । प꣡रि꣢꣯ । ए꣣षि । वि꣡श्व꣢तः । म꣡धोः꣢꣯ । धा꣡रा꣢꣯ । अ꣣सृक्षत ॥७७२॥

Mantra without Swara
अया पवस्व देवयू रेभन्पवित्रं पर्येषि विश्वतः । मधोर्धारा असृक्षत ॥

अया । पवस्व । देवयुः । रेभन् । पवित्रम् । परि । एषि । विश्वतः । मधोः । धारा । असृक्षत ॥७७२॥

Samveda - Mantra Number : 772
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 6;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे पवित्र करने हारे रसागार परमात्मन् ! (देवयुः) स्तोता उपासक से प्रीति करनेवाले आप (अया) इस आनन्दधारा के साथ (पवस्व) प्रवाहित होवो। (रेभन्) उपदेश करते हुए आप (विश्वतः) सब ओर से (पवित्रम्) पवित्र अन्तःकरण में (पर्येषि) आते हो। आपके पास से (मधोः) मधुर आनन्द की (धाराः)धाराएँ (असृक्षत) छूटती हैं ॥१॥
Essence
आनन्द-रस के भण्डार परमेश्वर से प्राप्त आनन्द-धाराएँ उपासक को कृत-कृत्य कर देती हैं ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा में परमात्मा का तथा उसके आनन्द-रस का वर्णन है।