Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 76

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- विश्वामित्रो गाथिनः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
इ꣡डा꣢मग्ने पुरु꣣द꣡ꣳस꣢ꣳ स꣣निं꣡ गोः श꣢꣯श्वत्त꣣म꣡ꣳ हव꣢꣯मानाय साध । स्या꣡न्नः꣢ सू꣣नु꣡स्तन꣢꣯यो वि꣣जा꣢꣫वाग्ने꣣ सा꣡ ते꣢ सुम꣣ति꣡र्भू꣢त्व꣣स्मे꣢ ॥७६॥

इ꣡डा꣢꣯म् । अ꣣ग्ने । पुरुदँ꣡स꣢म् । पु꣣रु । दँ꣡स꣢꣯म् । स꣣नि꣢म् । गोः । श꣣श्वत्तम꣢म् । ह꣡व꣢꣯मानाय । सा꣣ध । स्या꣢त् । नः꣣ । सूनुः꣢ । त꣡न꣢꣯यः । वि꣣जा꣡वा꣢ । वि꣣ । जा꣡वा꣢꣯ । अ꣡ग्ने꣣ । सा । ते꣣ । सुमतिः꣢ । सु꣣ । मतिः꣢ । भू꣣तु । अस्मे꣡इति꣢ ॥७६॥

Mantra without Swara
इडामग्ने पुरुदꣳसꣳ सनिं गोः शश्वत्तमꣳ हवमानाय साध । स्यान्नः सूनुस्तनयो विजावाग्ने सा ते सुमतिर्भूत्वस्मे ॥

इडाम् । अग्ने । पुरुदँसम् । पुरु । दँसम् । सनिम् । गोः । शश्वत्तमम् । हवमानाय । साध । स्यात् । नः । सूनुः । तनयः । विजावा । वि । जावा । अग्ने । सा । ते । सुमतिः । सु । मतिः । भूतु । अस्मेइति ॥७६॥

Samveda - Mantra Number : 76
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 8;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (अग्ने) सबके अग्रनायक परमात्मन् ! आप (हवमानाय) अग्निहोत्र करनेवाले तथा आत्मसमर्पण-रूप हवि देनेवाले मेरे लिए (इडाम्) भूमि, अन्न और प्रशस्त वाणी तथा (गोः) गाय की (पुरुदंसम्) अनेकों यज्ञकर्मों को सिद्ध करनेवाली (सनिम्) दूध, दही, मक्खन आदि देनों को (शश्वत्तमम्) निरन्तर (साध) प्रदान करते रहिए। (नः) हमारा (सूनुः) पुत्र (तनयः) वंश, धन, सुख, कीर्ति आदि का विस्तार करनेवाला, (विजावा) विजयशील और विविध ऐश्वर्यों का उत्पादक (स्यात्) होवे। हे (अग्ने) ज्योतिष्प्रदाता परमात्मन् ! (सा) वह प्रसिद्ध (ते) आपकी (सुमतिः) अनुग्रहात्मक बुद्धि (अस्मे) हमें (भूतु) प्राप्त होवे ॥४॥
Essence
हे परमपिता परमात्मन् ! अग्निहोत्ररूप देवयज्ञ को तथा स्तुति, प्रार्थना, उपासना, समर्पणरूप ब्रह्मयज्ञ को करनेवाले मुझे कृपा कर कृषि एवं साम्राज्य के लिए भूमि, भोजन के लिए भोज्य अन्न आदि, ज्ञान-प्रसार के लिए प्रशस्त वाणी और शरीर की पुष्टि तथा दान के लिए गाय का दूध-दही-घी आदि प्रदान कीजिए। हमारी सन्तान को कुल, धन, धर्म, सुख, सामर्थ्य, न्याय, कीर्ति, चक्रवर्ती राज्य आदि का विस्तार करनेवाला और सब रिपुओं को जीतनेवाला बनाइये ॥४॥
Subject
अगले मन्त्र में परमात्मा से प्रार्थना की गयी है।