Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 754

1875 Mantra
Devata- अश्विनौ Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- प्रगाथः(विषमा बृहती, समा सतोबृहती) Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
यु꣣वं꣢ चि꣣त्रं꣡ द꣢दथु꣣र्भो꣡ज꣢नं नरा꣣ चो꣡दे꣢थाꣳ सू꣣नृ꣡ता꣢वते । अ꣣र्वा꣢꣫ग्रथ꣣ꣳ स꣡म꣢नसा꣣ नि꣡ य꣢च्छतं꣣ पि꣡ब꣢तꣳ सो꣣म्यं꣡ मधु꣢꣯ ॥७५४॥

यु꣣व꣢म् । चि꣣त्र꣢म् । द꣣दथुः । भो꣡ज꣢꣯नम् । न꣣रा । चो꣡दे꣢꣯थाम् । सू꣣नृ꣡ता꣢वते । सु꣣ । नृ꣡ता꣢꣯वते । अ꣡र्वा꣢क् । र꣡थ꣢꣯म् । स꣡म꣢꣯नसा । स । म꣣नसा । नि꣢ । य꣡च्छतम् । पि꣡ब꣢꣯तम् । सो꣣म्य꣢म् । म꣡धु꣢꣯ ॥७५४॥

Mantra without Swara
युवं चित्रं ददथुर्भोजनं नरा चोदेथाꣳ सूनृतावते । अर्वाग्रथꣳ समनसा नि यच्छतं पिबतꣳ सोम्यं मधु ॥

युवम् । चित्रम् । ददथुः । भोजनम् । नरा । चोदेथाम् । सूनृतावते । सु । नृतावते । अर्वाक् । रथम् । समनसा । स । मनसा । नि । यच्छतम् । पिबतम् । सोम्यम् । मधु ॥७५४॥

Samveda - Mantra Number : 754
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 4;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (नरा) नेतृत्व करनेवाले ब्राह्मण और क्षत्रियो ! (युवम्) तुम (चित्रम्) अद्भुत (भोजनम्) पालन को (ददथुः) देते हो। उस पालन को तुम (सूनृतावते) प्रिय-सत्य वाणीवाले मेरे लिए भी (चोदेथाम्) प्रेरित करो, प्रदान करो। (समनसा) अनुकूल मनवाले होते हुए तुम दोनों, अपने (रथम्) रथ को (अर्वाक्) हमारी ओर (नि यच्छतम्) मोड़ो, अर्थात् हमारी ओर आओ और आकर (सोम्यम्) सोमरस से युक्त (मधु) मधु को (पिबतम्) पिओ, अर्थात् हमारे द्वारा किये गये सत्कार को ग्रहण करो ॥२॥
Essence
ब्राह्मण लोग ज्ञान-दान के द्वारा और क्षत्रिय लोग रक्षा-प्रदान द्वारा प्रजाजनों का उपकार करते हैं, अतः उनका यथोचित सत्कार और उनसे लाभग्रहण सबको करना चाहिए ॥२॥ इस खण्ड में अग्निहोत्र, दिव्य उषा, दिव्य सूर्य तथा ब्रह्म-क्षत्र का वर्णन होने से पूर्व खण्ड के साथ इस खण्ड की सङ्गति है ॥ द्वितीय अध्याय में चतुर्थ खण्ड समाप्त ॥
Subject
अगले मन्त्र में पुनः उसी विषय का वर्णन है।