Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 736

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
तं꣢ ते꣣ य꣢वं꣣ य꣢था꣣ गो꣡भिः꣢ स्वा꣣दु꣡म꣢कर्म श्री꣣ण꣡न्तः꣢ । इ꣡न्द्र꣢ त्वा꣣स्मिं꣡त्स꣢ध꣣मा꣡दे꣢ ॥७३६॥

तम् । ते꣣ । य꣡व꣢꣯म् । य꣡था꣢꣯ । गो꣡भिः꣢꣯ । स्वा꣣दु꣢म् । अ꣣कर्म । श्रीण꣡न्तः꣢ । इ꣡न्द्र꣢꣯ । त्वा꣣ । अस्मि꣣न् । स꣣धमा꣡दे꣢ । स꣣ध । मा꣡दे꣢꣯ ॥७३६॥

Mantra without Swara
तं ते यवं यथा गोभिः स्वादुमकर्म श्रीणन्तः । इन्द्र त्वास्मिंत्सधमादे ॥

तम् । ते । यवम् । यथा । गोभिः । स्वादुम् । अकर्म । श्रीणन्तः । इन्द्र । त्वा । अस्मिन् । सधमादे । सध । मादे ॥७३६॥

Samveda - Mantra Number : 736
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 2;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे शिष्य ! (तम्) उस ब्रह्मविद्यारूप सोमरस को (गोभिः) मधुर वाणियों से (श्रीणन्तः) परिपक्व करते हुए हमने (स्वादुम्) स्वादु (अकर्म) कर लिया है, (यथा) जैसे (यवम्) जौ के रस को (गोभिः) गाय के दूध से मधुर कर लेते हैं। हे (इन्द्र) प्रिय शिष्य ! (अस्मिन्) इस (सधमादे) जिसमें साथ मिलकर ब्रह्मज्ञान का पान करते हैं, ऐसे विद्या-यज्ञ में (त्वा) तुझे, हम ब्रह्मज्ञान का रस पीने के लिए बुला रहे हैं ॥३॥ इस मन्त्र में श्लिष्टोपमालङ्कार है ॥३॥
Essence
गुरुओं को चाहिए कि वे शिष्यों को लौकिक ज्ञान तथा ब्रह्मज्ञान नीरस रूप में नहीं, किन्तु सरस रूप में दें, जिससे उनकी उसमें रुचि हो ॥३॥ इस खण्ड में गुरु-शिष्य का विषय, परमेश्वर-जीवात्मा का विषय तथा ब्रह्मज्ञान का विषय वर्णित होने से इस खण्ड की पूर्वखण्ड के साथ सङ्गति है ॥ द्वितीय अध्याय में द्वितीय खण्ड समाप्त ॥
Subject
अगले मन्त्र में पुनः उसी विषय का वर्णन है।