Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 735

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
नृ꣡भि꣢र्धौ꣣तः꣢ सु꣣तो꣢꣫ अश्नै꣣र꣢व्या꣣ वा꣢रैः꣣ प꣡रि꣢पूतः । अ꣢श्वो꣣ न꣢ नि꣣क्तो꣢ न꣣दी꣡षु꣢ ॥७३५॥

नृ꣡भिः꣢꣯ । धौ꣣तः꣢ । सु꣣तः꣢ । अ꣡श्नैः꣢꣯ । अ꣡व्याः꣢꣯ । वा꣡रैः꣢꣯ । प꣡रि꣢꣯पूतः । प꣡रि꣢꣯ । पू꣣तः । अ꣡श्वः꣢꣯ । न । नि꣣क्तः꣢ । न꣣दी꣡षु꣢ ॥७३५॥

Mantra without Swara
नृभिर्धौतः सुतो अश्नैरव्या वारैः परिपूतः । अश्वो न निक्तो नदीषु ॥

नृभिः । धौतः । सुतः । अश्नैः । अव्याः । वारैः । परिपूतः । परि । पूतः । अश्वः । न । निक्तः । नदीषु ॥७३५॥

Samveda - Mantra Number : 735
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 2;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे शिष्य ! मेरे द्वारा जो तुझे ब्रह्मज्ञान-रस दिया जा रहा है वह (नृभिः) उन्नायक श्रेष्ठ विचारों द्वारा (धौतः) धोया गया है, (अश्नैः) पाषाणों के समान कठोर व्रताचरणों द्वारा (सुतः) अभिषुत किया गया है, (अव्याः) रक्षा करनेवाली बुद्धि के (वारैः) दोषनिवारक तर्कों द्वारा (परिपूतः) पवित्र किया गया है और (नदीषु) नदियों में (निक्तः) नहलाकर साफ किये गये (अश्वः न) घोड़े के समान (नदीषु) वेदवाणी की धाराओं में (निक्तः) शुद्ध किया गया है ॥२॥ इस मन्त्र में श्लिष्टोपमालङ्कार है। यहाँ श्लेष से सोम ओषधि के पक्ष में भी अर्थ-योजना करनी चाहिए। इससे ‘ब्रह्मविज्ञान सोमरस के समान है’ यह उपमानोपमेयभाव द्योतित होगा ॥२॥
Essence
जैसे ऋत्विज् लोग सोमलता को पवित्र जल से धोकर, सिल-बट्टों से कूटकर, रस निचोड़ कर, दशापवित्र नामक छन्नी से छानकर शुद्ध हुए सोमरस को अग्नि में होम करते हैं, वैसे ही गुरुजन ब्रह्मविद्यारूप लता को सद्विचारों से धोकर, कठोर व्रताचरणों से कूटकर, बुद्धि के तर्कों से छानकर, वेदवाणी की धाराओं में पवित्र करके शिष्य की आत्माग्नि में होम करते हैं ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में यह बताया गया है कि वह ब्रह्मविज्ञान-रस कैसा है।