Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 727

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- इरिम्बिठिः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
य꣡स्ते꣢ शृङ्गवृषो णपा꣣त्प्र꣡ण꣢पात्कुण्ड꣣पा꣡य्यः꣢ । न्य꣢꣯स्मिन् दध्र꣣ आ꣡ मनः꣢꣯ ॥७२७॥

यः꣢ । ते꣣ । शृङ्गवृषः । शृङ्ग । वृषः । नपात् । प्र꣡ण꣢꣯पात् । प्र । न꣣पात् । कुण्डपा꣡य्यः꣢ । कु꣣ण्ड । पा꣡य्यः꣢꣯ । नि । अ꣣स्मिन् । दध्रे । आ꣢ । म꣡नः꣢꣯ ॥७२७॥

Mantra without Swara
यस्ते शृङ्गवृषो णपात्प्रणपात्कुण्डपाय्यः । न्यस्मिन् दध्र आ मनः ॥

यः । ते । शृङ्गवृषः । शृङ्ग । वृषः । नपात् । प्रणपात् । प्र । नपात् । कुण्डपाय्यः । कुण्ड । पाय्यः । नि । अस्मिन् । दध्रे । आ । मनः ॥७२७॥

Samveda - Mantra Number : 727
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 2;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (शृङ्गवृषः नपात्) रश्मियों से वर्षा करनेवाले सूर्य को बिना ही आधार के आकाश में स्थिर करनेवाले जगदीश्वर ! (यः ते) जो आपका (प्र नपात्) प्रकृष्ट रूप से रक्षक (कुण्डपाय्यः) समुद्ररूप कुण्ड जिसमें सूर्य द्वारा पिये जाते हैं, ऐसा वृष्टिरूप यज्ञ है, (अस्मिन्) इसमें, उपासक लोग (मनः) अपने मन को (आ निदध्रे) निहित करते हैं ॥३॥
Essence
जैसे सूर्य समुद्ररूप कुण्डों को पीकर बादल बना कर वर्षा करता है, वैसे ही मनुष्यों को चाहिए कि धन कमाकर और योगसिद्धियाँ प्राप्त करके सत्पात्रों में उनकी वर्षा करें ॥३॥
Subject
अगले मन्त्र में पुनः उसी विषय का वर्णन है।