Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 717

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
श꣢꣫ꣳसेदु꣣क्थ꣢ꣳ सु꣣दा꣡न꣢व उ꣣त꣢ द्यु꣣क्षं꣢꣫ यथा꣣ न꣡रः꣢ । च꣣कृमा꣢ स꣣त्य꣡रा꣢धसे ॥७१७॥

श꣡ꣳस꣢꣯ । इत् । उ꣣क्थ꣢म् । सु꣣दा꣡न꣢वे । सु꣣ । दा꣡न꣢वे । उ꣡त꣢ । द्यु꣣क्ष꣢म् । द्यु꣣ । क्ष꣢म् । य꣡था꣢꣯ । न꣡रः꣢꣯ । च꣣कृम꣢ । स꣣त्य꣡रा꣢धसे । स꣣त्य꣢ । रा꣣धसे ॥७१७॥

Mantra without Swara
शꣳसेदुक्थꣳ सुदानव उत द्युक्षं यथा नरः । चकृमा सत्यराधसे ॥

शꣳस । इत् । उक्थम् । सुदानवे । सु । दानवे । उत । द्युक्षम् । द्यु । क्षम् । यथा । नरः । चकृम । सत्यराधसे । सत्य । राधसे ॥७१७॥

Samveda - Mantra Number : 717
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 1;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे साथी ! तू (सुदानवे) उत्कृष्ट दानी इन्द्र परमात्मा के लिए (उक्थम्) स्तोत्र का (उत) और (द्युक्षम्) तेज का निवास करानेवाले उसके गुण-कर्म-स्वभाव का (शंस इत्) अवश्य कीर्तन कर, (यथा) जिस प्रकार (नरः) नेता हम लोग (सत्यराधसे) सच्चे धनवाले उसके लिये (चकृम) स्तोत्र का तथा उसके गुण-कर्म-स्वभाव का कीर्तन करते हैं ॥२॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है ॥२॥
Essence
सब मनुष्यों को चहिये कि जगदीश्वर के गुण-कर्म-स्वभाव का कीर्तन करके उसके अनुकूल अपना जीवन बनायें ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में परमात्मा की स्तुति के लिये प्रेरणा है।