Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 713

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- श्रुतकक्षः सुकक्षो वा आङ्गिरसः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
पा꣢न्त꣣मा꣢ वो꣣ अ꣡न्ध꣢स꣣ इ꣡न्द्र꣢म꣣भि꣡ प्र गा꣢꣯यत । वि꣣श्वासा꣡ह꣢ꣳ श꣣त꣡क्र꣢तुं꣣ म꣡ꣳहि꣢ष्ठं चर्षणी꣣ना꣢म् ॥७१३॥

पा꣡न्त꣢꣯म् । आ । वः꣣ । अ꣡न्ध꣢꣯सः । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । अ꣣भि꣢ । प्र । गा꣣यत । विश्वासा꣡ह꣢म् । वि꣣श्वा । सा꣡ह꣢꣯म् । श꣣त꣡क्र꣢तुम् । श꣣त꣢ । क्र꣣तुम् । म꣡ꣳहि꣢꣯ष्ठम् । च꣣र्षणीना꣢म् ॥७१३॥

Mantra without Swara
पान्तमा वो अन्धस इन्द्रमभि प्र गायत । विश्वासाहꣳ शतक्रतुं मꣳहिष्ठं चर्षणीनाम् ॥

पान्तम् । आ । वः । अन्धसः । इन्द्रम् । अभि । प्र । गायत । विश्वासाहम् । विश्वा । साहम् । शतक्रतुम् । शत । क्रतुम् । मꣳहिष्ठम् । चर्षणीनाम् ॥७१३॥

Samveda - Mantra Number : 713
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 1;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे शिष्यो ! (वः) तुम (अन्धसः) विद्या-रस की (पान्तम्) रक्षा करनेवाले, (विश्वासाहम्) काम, क्रोध, अज्ञान, आलस्य आदि सब शत्रुओं को पराजित करनेवाले, (शतक्रतुम्) बहुत बुद्धिमान् तथा बहुत कर्मण्य, (चर्षणीनाम्) पुरुषार्थी छात्रों को (मंहिष्ठम्) अतिशय विद्या और सदाचार का दान करनेवाले (इन्द्रम् अभि) अगाध ज्ञान आदि ऐश्वर्य से शोभायमान आचार्य को लक्ष्य करके (प्र गायत) भली-भाँति स्तुति करो ॥१॥
Essence
जो शिष्य विद्या के समुद्र, शिक्षण-कला में कुशल, सदाचारी, ब्रह्मिष्ठ गुरु की श्रद्धा के साथ सेवा करते हैं, वे विद्वान्, सदाचारी, ब्रह्मज्ञानी होकर अभ्युदय प्राप्त करते हैं ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा की व्याख्या पूर्वार्चिक में १५५ क्रमाङ्क पर परमात्मा और राजा के पक्ष में हो चुकी है। यहाँ गुरु-शिष्य का वर्णन करते हैं।