Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 708

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- सौभरि: काण्व: Chhand- काकुभः प्रगाथः (विषमा ककुप्, समा सतोबृहती) Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
व꣣य꣢मु꣣ त्वा꣡म꣢पूर्व्य स्थू꣣रं꣢꣫ न कच्चि꣣द्भ꣡र꣢न्तोऽव꣣स्य꣡वः꣢ । व꣡ज्रि꣢ञ्चि꣣त्र꣡ꣳ ह꣢वामहे ॥७०८॥

व꣣य꣢म् । उ꣣ । त्वा꣢म् । अ꣣पूर्व्य । अ । पूर्व्य । स्थूर꣢म् । न । कत् । चि꣣त् । भ꣡र꣢꣯न्तः । अ꣣वस्य꣡वः꣢ । व꣡ज्रि꣢꣯न् । चि꣣त्र꣢म् । ह꣣वामहे ॥७०८॥

Mantra without Swara
वयमु त्वामपूर्व्य स्थूरं न कच्चिद्भरन्तोऽवस्यवः । वज्रिञ्चित्रꣳ हवामहे ॥

वयम् । उ । त्वाम् । अपूर्व्य । अ । पूर्व्य । स्थूरम् । न । कत् । चित् । भरन्तः । अवस्यवः । वज्रिन् । चित्रम् । हवामहे ॥७०८॥

Samveda - Mantra Number : 708
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 6;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (अपूर्व्य) अद्वितीय बल से युक्त, (वज्रिन्) काम, क्रोध आदि शत्रुओं पर वज्र-प्रहार करनेवाले मेरे अन्तरात्मा ! (अवस्यवः) प्रगति को चाहनेवाले (वयम्) हम (चित्रम्) अद्भुत गुण-कर्म-स्वभाववाले (त्वाम्) आपको (आह्वयामः) पुकारते हैं। किस प्रकार? (न) जैसे (कच्चित्) किसी (स्थूरम्) स्थूल बड़ी वस्तु को (हरन्तः) दूसरे स्थान पर ले जाते हुए लोग, सहायता के लिये किसी को पुकारते हैं ॥१॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है ॥१॥
Essence
प्रगति के मार्ग पर दौड़ने के लिये अपना अन्तरात्मा मनुष्य का परम सहायक होता है ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में क्रमाङ्क ४०८ पर परमेश्वर, आचार्य और वैद्यराज के पक्ष में व्याख्यात हो चुकी है। यहाँ जीवात्मा को कहा जा रहा है।