Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 707

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
न꣡ हि ते꣢꣯ पू꣣र्त꣡म꣢क्षि꣣प꣡द्भुव꣢꣯न्नेमानां पते । अ꣢था꣣ दु꣡वो꣢ वनवसे ॥७०७॥

न꣢ । हि । ते꣣ । पूर्त꣢म् । अ꣣क्षिप꣢त् । अ꣣क्षि । प꣢त् । भु꣡व꣢꣯त् । ने꣣मानाम् । पते । अ꣡थ꣢꣯ । दु꣡वः꣢꣯ । व꣣नवसे ॥७०७॥

Mantra without Swara
न हि ते पूर्तमक्षिपद्भुवन्नेमानां पते । अथा दुवो वनवसे ॥

न । हि । ते । पूर्तम् । अक्षिपत् । अक्षि । पत् । भुवत् । नेमानाम् । पते । अथ । दुवः । वनवसे ॥७०७॥

Samveda - Mantra Number : 707
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 6;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (नेमानां पते) हम अपूर्णों के पालनकर्ता आचार्यवर ! (ते) आपका (पूर्तम्) पालनपूरण (अक्षिपत्) आँख आदि इन्द्रियों को पतन की ओर ले जानेवाला (नहि) न (भुवत्) होवे। (अथ) और, आप हमारे (दुवः) सत्कार को (वनवसे) स्वीकार कीजिए ॥३॥
Essence
गुरुजन शिष्यों को भली-भाँति पढ़ाकर सदाचार में प्रवृत्त करें और शिष्य उनका श्रद्धा के साथ सत्कार करें ॥३॥
Subject
अगले मन्त्र में शिष्य गुरु को कह रहे हैं।