Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 705

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ए꣢ह्यू꣣ षु꣡ ब्रवा꣢꣯णि꣣ ते꣡ऽग्न꣢ इ꣣त्थे꣡त꣢रा꣣ गि꣡रः꣢ । ए꣣भि꣡र्व꣢र्धास꣣ इ꣡न्दु꣢भिः ॥७०५॥

आ꣢ । इ꣣हि । ऊ । सु꣢ । ब्र꣡वा꣢꣯णि । ते꣣ । अ꣡ग्ने꣢꣯ । इ꣣त्था꣢ । इ꣡त꣢꣯राः । गि꣡रः꣢꣯ । ए꣣भिः꣢ । व꣣र्द्धासे । इ꣡न्दु꣢꣯भिः ॥७०५॥

Mantra without Swara
एह्यू षु ब्रवाणि तेऽग्न इत्थेतरा गिरः । एभिर्वर्धास इन्दुभिः ॥

आ । इहि । ऊ । सु । ब्रवाणि । ते । अग्ने । इत्था । इतराः । गिरः । एभिः । वर्द्धासे । इन्दुभिः ॥७०५॥

Samveda - Mantra Number : 705
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 6;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (अग्ने) तपस्वी विद्यार्थी ! (एहि उ) आ, मैं (ते) तेरे लिये (सु) भली-भाँति (इत्था) सच्चे रूप में (इतराः) सामान्य वाणियों से विलक्षण प्रकार की (गिरः) शास्त्रवाणियों का (ब्रवाणि) उपदेश करूँ। तू (एभिः) इन (इन्दुभिः) विद्या-रसों से (वर्धासे) वृद्धि को प्राप्त कर ॥१॥
Essence
गुरुओं को चाहिये कि प्रेम से बुलाकर शिष्यों को मनोयोग से पढ़ाएँ ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा की व्याख्या पूर्वार्चिक में क्रमाङ्क ७ पर परमेश्वरोपासना के विषय में की गयी थी। यहाँ गुरु शिष्य को सम्बोधन कर रहा है।