Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 70

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
इ꣣न्धे꣢꣫ राजा꣣ स꣢म꣣र्यो꣡ नमो꣢꣯भि꣣र्य꣢स्य꣣ प्र꣡ती꣢क꣣मा꣡हु꣢तं घृ꣣ते꣡न꣢ । न꣡रो꣢ ह꣣व्ये꣡भि꣢रीडते स꣣बा꣢ध꣡ आ꣡ग्निरग्र꣢꣯मु꣣ष꣡सा꣢मशोचि ॥७०॥

इ꣣न्धे꣢ । रा꣡जा꣢꣯ । सम् । अ꣣र्यः꣢ । न꣡मो꣢꣯भिः । य꣡स्य꣢꣯ । प्र꣡ती꣢꣯कम् । आ꣡हु꣢꣯तम् । आ । हु꣣तम् । घृते꣡न꣢ । न꣡रः꣢꣯ । ह꣣व्ये꣡भिः꣢ । ई꣣डते । स꣣बा꣡धः꣢ । स꣣ । बा꣡धः꣢꣯ । आ । अ꣣ग्निः꣢ । अ꣡ग्र꣢꣯म् । उ꣣ष꣡सा꣢म् । अ꣣शोचि ॥७०॥

Mantra without Swara
इन्धे राजा समर्यो नमोभिर्यस्य प्रतीकमाहुतं घृतेन । नरो हव्येभिरीडते सबाध आग्निरग्रमुषसामशोचि ॥

इन्धे । राजा । सम् । अर्यः । नमोभिः । यस्य । प्रतीकम् । आहुतम् । आ । हुतम् । घृतेन । नरः । हव्येभिः । ईडते । सबाधः । स । बाधः । आ । अग्निः । अग्रम् । उषसाम् । अशोचि ॥७०॥

Samveda - Mantra Number : 70
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 7;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रथम—यज्ञाग्नि के पक्ष में। (अर्यः) हवि-वहन के कर्म का स्वामी (राजा) वेदि में विराजमान यज्ञाग्नि (नमोभिः) सुगन्धित, मधुर, पुष्टिवर्धक और आरोग्यवर्द्धक हवि के अन्नों से (सम् इन्धे) भली-भाँति प्रदीप्त किया जाता है, (यस्य) जिस यज्ञाग्नि का (प्रतीकम्) ज्वाला-रूप मुख (घृतेन) घृत से (आहुतम्) आहुत होता है। (सबाधः) ऋत्विज (नरः) मनुष्य, उस यज्ञाग्नि का (हव्येभिः) हवियों से (ईडते) सत्कार करते हैं। (अग्निः) वह यज्ञाग्नि (उषसाम्) उषाओं के (अग्रम्) सामने (आ अशोचि) चारों ओर यज्ञवेदि में प्रदीप्त किया जाता है ॥ द्वितीय—परमात्मा के पक्ष में। (अर्यः) सबका स्वामी (राजा) सम्राट् परमात्मा (नमोभिः) नमस्कारों द्वारा (सम् इन्धे) हृदय में भली-भाँति प्रकाशित होता है, (यस्य) जिस परमात्मा का (प्रतीकम्) स्वरूप (घृतेन) तेज से (आहुतम्) व्याप्त है। (सबाधः) बाधाओं से आक्रान्त (नरः) मनुष्य (हव्येभिः) आत्म-समर्पण रूप हवियों से, उस परमात्मा की (ईडते) पूजा करते हैं। (अग्निः) वह परमात्मा (उषसाम्) उषाओं के (अग्रम्) आगे (आ अशोचि) उपासकों के हृदय में प्रदीप्त होता है। अभिप्राय यह है कि प्रभात काल में धारणा, ध्यान एवं समाधि के सुगम होने से हृदय में परमेश्वर के तेज का अनुभव सुलभ होता है ॥८॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। यज्ञाग्नि और परमेश्वराग्नि में उपमानोपमेयभाव व्यङ्ग्य है ॥८॥
Essence
जैसे यज्ञवेदि में यज्ञाग्नि को हवियों से प्रदीप्त करते हैं, वैसे ही मनुष्यों को चाहिए कि हृदय में परमात्मा को नमस्कारों द्वारा प्रदीप्त करें ॥८॥
Subject
अगले मन्त्र में यज्ञाग्नि के सादृश्य से परमात्माग्नि का विषय वर्णित है।