Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 695

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अग्निश्चाक्षुषः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
अ꣣यं꣡ भरा꣢꣯य सान꣣सि꣡रिन्द्रा꣢꣯य पवते सु꣣तः꣢ । सो꣢मो꣣ जै꣡त्र꣢स्य चेतति꣣ य꣡था꣢ वि꣣दे꣢ ॥६९५॥

अ꣣य꣢म् । भ꣡रा꣢꣯य । सा꣣नसिः꣢ । इ꣡न्द्रा꣢꣯य । प꣣वते । सुतः꣢ । सो꣡मः꣢꣯ । जै꣡त्र꣢स्य । चे॓तति । य꣡था꣢ । वि꣢दे꣢ ॥६९५॥

Mantra without Swara
अयं भराय सानसिरिन्द्राय पवते सुतः । सोमो जैत्रस्य चेतति यथा विदे ॥

अयम् । भराय । सानसिः । इन्द्राय । पवते । सुतः । सोमः । जैत्रस्य । चे॓तति । यथा । विदे ॥६९५॥

Samveda - Mantra Number : 695
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 5;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
(भराय) देवासुरसंग्राम में जीतने के लिए (सानसिः) संभजनीय, (सुतः) आचार्य द्वारा शिष्यों में प्रेरित (अयम्) यह ज्ञान-कर्म-उपासना का रस (इन्द्राय) आत्मा के लिए (पवते) प्रवाहित हो रहा है। (जैत्रस्य) विजयशील उस आत्मा का (सोमः) वह ज्ञान-कर्म-उपासना का रस (चेतति) सदैव जागता रहे, (यथा) जिससे, वह (विदे) सदा कर्तव्य-अकर्तव्य को पहचानता रहे ॥२॥
Essence
ज्ञान, तदनुकूल कर्म और परमेश्वर की उपासना सदैव मनुष्य को संसार के समरांगण में विजय दिलाते हैं ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में पुनः उसी विषय का वर्णन है।