Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 687

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- कलिः प्रागाथः Chhand- प्रगाथः(विषमा बृहती समा सतोबृहती) Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
त꣡रो꣢भिर्वो वि꣣द꣡द्व꣢सु꣣मि꣡न्द्र꣢ꣳ स꣣बा꣡ध꣢ ऊ꣣त꣡ये꣢ । बृ꣣ह꣡द्गाय꣢꣯न्तः सु꣣त꣡सो꣢मे अध्व꣣रे꣢ हु꣣वे꣢꣫ भरं꣣ न꣢ का꣣रि꣡ण꣢म् ॥६८७॥

त꣡रो꣢꣯भिः । वः꣣ । विद꣡द्व꣢सुम् । वि꣣द꣢त् । व꣣सुम् । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । स꣡बा꣢꣯धः । स꣣ । बा꣡धः꣢꣯ । ऊ꣡त꣡ये꣢ । बृ꣡ह꣢त् । गा꣡य꣢꣯न्तः । सु꣣त꣡सो꣢मे । सु꣡त꣢ । सो꣣मे । अध्वरे꣢ । हु꣣वे꣢ । भ꣡र꣢꣯म् । न । का꣣रि꣡ण꣢म् ॥६८७॥

Mantra without Swara
तरोभिर्वो विदद्वसुमिन्द्रꣳ सबाध ऊतये । बृहद्गायन्तः सुतसोमे अध्वरे हुवे भरं न कारिणम् ॥

तरोभिः । वः । विदद्वसुम् । विदत् । वसुम् । इन्द्रम् । सबाधः । स । बाधः । ऊतये । बृहत् । गायन्तः । सुतसोमे । सुत । सोमे । अध्वरे । हुवे । भरम् । न । कारिणम् ॥६८७॥

Samveda - Mantra Number : 687
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 4;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे मनुष्यो ! (सबाधः) अविद्यारूप बाधा से पीड़ित होने पर (वः) आप लोग (ऊतये) रक्षा के लिए (तरोभिः) वेगों के साथ (विदद्वसुम्) ब्रह्मविद्यारूप धन को प्राप्त करानेवाले (इन्द्रम्) आचार्य का (बृहत्) बहुत अधिक (गायन्तः) महिमा-गान करो। मैं भी (सुतसोमे) जिसमें विद्यारस का निष्पादन होता है, उस (अध्वरे) विद्या-यज्ञ में (भरं न) कुटुम्बभार को वहन करनेवाले गृहस्वामी के समान (कारिणम्) कर्मयोगी आचार्य को (हुवे) ब्रह्मविद्या ग्रहण करने के लिए पुकारता हूँ ॥१॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है ॥१॥
Essence
मनुष्यों को चाहिए कि ब्रह्म का साक्षात्कार पाने के लिए ऐसे सुयोग्य गुरु का आश्रय लें, जिसने स्वयं भी ब्रह्म का साक्षात्कार किया हो ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा की पूर्वार्चिक में क्रमाङ्क २३७ पर परमेश्वरपक्ष में व्याख्या की गयी थी। यहाँ ब्रह्मविद्या के उपदेष्टा आचार्य को बुला रहे हैं ॥१॥