Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 681

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- प्रगाथः(विषमा बृहती समा सतोबृहती) Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
न꣡ त्वावा꣢꣯ꣳ अ꣣न्यो꣢ दि꣣व्यो꣡ न पार्थि꣢꣯वो꣣ न꣢ जा꣣तो꣡ न ज꣢꣯निष्यते । अ꣣श्वाय꣡न्तो꣢ मघवन्निन्द्र वा꣣जि꣡नो꣢ ग꣣व्य꣡न्त꣢स्त्वा हवामहे ॥६८१॥

न꣢ । त्वा꣡वा꣢꣯न् । अ꣣न्यः꣢ । अ꣣न् । यः꣢ । दि꣣व्यः꣢ । न । पा꣡र्थि꣢꣯वः । न । जा꣡तः꣢ । न । ज꣡निष्यते । अश्वाय꣡न्तः꣢ । मघ꣣वन् । इन्द्र । वाजि꣡नः꣢ । ग꣣व्य꣡न्तः꣢ । त्वा꣣ । हवामहे ॥६८१॥

Mantra without Swara
न त्वावाꣳ अन्यो दिव्यो न पार्थिवो न जातो न जनिष्यते । अश्वायन्तो मघवन्निन्द्र वाजिनो गव्यन्तस्त्वा हवामहे ॥

न । त्वावान् । अन्यः । अन् । यः । दिव्यः । न । पार्थिवः । न । जातः । न । जनिष्यते । अश्वायन्तः । मघवन् । इन्द्र । वाजिनः । गव्यन्तः । त्वा । हवामहे ॥६८१॥

Samveda - Mantra Number : 681
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 4;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे परमेश्वर ! (अन्यः) दूसरा (त्वावान्) तेरे समान (न दिव्यः) न आकाशवर्ती और (न पार्थिवः) न भूमिवर्ती कोई पदार्थ है। तेरे समान (न जातः) न कोई पदार्थ उत्पन्न हुआ है, (न जनिष्यते) न भविष्य में उत्पन्न होगा। हे (मघवन्) ऐश्वर्यशालिन् (इन्द्र) परमात्मन् ! (वाजिनः) बलवान् तथा पुरुषार्थी हम (अश्वायन्तः) श्रेष्ठ प्राणों की कामनावाले और (गव्यन्तः) इन्द्रियरूप गौओं के श्रेष्ठ ज्ञान व कर्म रूप दूध की कामनावाले होकर (त्वा) तुझे (हवामहे) पुकार रहे हैं ॥२॥ इस मन्त्र में ‘उसके मुख के तुल्य कोई अन्य वस्तु नहीं है, न ही नेत्रों के तुल्य है’ इस अर्थवाली साहित्यदर्पण १०।२० में उदाहृत उक्ति के समान उपमानलुप्तोपमालङ्कार है ॥२॥
Essence
अलौकिक तथा अद्वितीय परमात्मा की उपासना करके बलवान् और पुरुषार्थी होकर सब लोग ऐहलौकिक तथा पारलौकिक अभीष्ट को प्राप्त कर सकते हैं ॥२॥
Subject
इस प्रकार अपने अन्तरात्मा को उद्बोधन देकर अब परमात्मा का आह्वान करते हैं।