Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 680

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- प्रगाथः(विषमा बृहती समा सतोबृहती) Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
अ꣣भि꣡ त्वा꣢ शूर नोनु꣣मो꣡ऽदु꣢ग्धा इव धे꣣न꣡वः꣢ । ई꣡शा꣢न꣣म꣡स्य जग꣢꣯तः स्व꣣र्दृ꣢श꣣मी꣡शा꣢नमिन्द्र त꣣स्थु꣡षः꣢ ॥६८०॥

अ꣣भि꣢ । त्वा꣣ । शूर । ना꣡नु꣢꣯मः । अ꣡दु꣢꣯ग्धाः । अ । दु꣣ग्धाः । इव । धे꣡न꣢वः । ई꣡शा꣢꣯नम् । अ꣣स्य꣢ । ज꣡ग꣢꣯तः । स्व꣣र्दृ꣡श꣢म् । स्वः꣣ । दृ꣡श꣢꣯म् । ई꣡शा꣢꣯नम् । इ꣣न्द्र । तस्थु꣡षः꣢ ॥६८०॥

Mantra without Swara
अभि त्वा शूर नोनुमोऽदुग्धा इव धेनवः । ईशानमस्य जगतः स्वर्दृशमीशानमिन्द्र तस्थुषः ॥

अभि । त्वा । शूर । नानुमः । अदुग्धाः । अ । दुग्धाः । इव । धेनवः । ईशानम् । अस्य । जगतः । स्वर्दृशम् । स्वः । दृशम् । ईशानम् । इन्द्र । तस्थुषः ॥६८०॥

Samveda - Mantra Number : 680
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 4;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (शूर इन्द्र) शूरवीर हमारे अन्तरात्मन् ! हम (त्वा अभि) तेरे प्रति (नोनुमः) बारम्बार स्तुति-शब्द बोलते हैं। किस तरह? (अदुग्धाः न) दुही हुई (धेनवः इव) गौएँ जैसे दुहे जाने की उत्कण्ठा को प्रकट करने के लिए बारम्बार शब्द करती हैं। तू कैसा है? (अस्य) इस (जगतः) दूर-दूर तक जानेवाले मन का (ईशानम्) स्वामी, (स्वर्दृशम्) आनन्द का द्रष्टा और (तस्थुषः) शरीर में अजंगम रूप में स्थित अङ्ग-प्रत्यङ्गों का भी (ईशानम्) स्वामी है। अतः हम (नोनुमः) तेरे गुणों का बार-बार वर्णन करते हैं, तुझे (उद्बोधन) देते हैं ॥१॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है ॥१॥
Essence
मनुष्य के आत्मा में महान् शक्तियाँ प्रसुप्त पड़ी हैं। सारे शरीरचक्र के अधिष्ठाता उस आत्मा को उद्बोधन देकर सभी लौकिक और आध्यात्मिक सिद्धियाँ प्राप्त की जा सकती हैं ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में २३३ क्रमाङ्क पर जगदीश्वर के पक्ष में व्याख्यात हो चुकी है। यहाँ अपने अन्तरात्मा को सम्बोधन है।