Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 673

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अहमीयुराङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
स꣢ न꣣ इ꣡न्द्रा꣢य꣣ य꣡ज्य꣢वे꣣ व꣡रु꣢णाय म꣣रु꣡द्भ्यः꣢ । व꣣रिवोवि꣡त्परि꣢꣯ स्रव ॥६७३॥

सः꣢ । नः꣣ । इ꣡न्द्रा꣢꣯य । य꣡ज्य꣢꣯वे । व꣡रु꣢꣯णाय । म꣣रु꣡द्भ्यः꣢ । व꣣रिवोवि꣢त् । व꣣रिवः । वि꣢त् । प꣡रि꣢꣯ । स्र꣣व ॥६७३॥

Mantra without Swara
स न इन्द्राय यज्यवे वरुणाय मरुद्भ्यः । वरिवोवित्परि स्रव ॥

सः । नः । इन्द्राय । यज्यवे । वरुणाय । मरुद्भ्यः । वरिवोवित् । वरिवः । वित् । परि । स्रव ॥६७३॥

Samveda - Mantra Number : 673
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 3;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे ज्ञानरस के भण्डार गुरु ! (सः) वह अतिशय गुणी आप (नः) हमारे (यज्यवे) विद्याध्ययन-यज्ञ के यजमानभूत (इन्द्राय) आत्मा के लिए, (वरुणाय) श्रेष्ठ मन के लिए और (मरुद्भ्यः) प्राणों के लिए (वरिवोवित्) उन-उनके अपने-अपने ऐश्वर्यों को प्राप्त करानेवाले होकर (परिस्रव) शिष्यों के मध्य विचरण कीजिए ॥२॥
Essence
गुरुओं को उचित है कि वे विद्या पढ़ाने के अतिरिक्त शिष्य के आत्मा, मन और प्राणों का भी विकास करें ॥२॥
Subject
द्वितीय ऋचा की पूर्वार्चिक में ५९२ क्रमाङ्क पर परमात्मा और राजा के विषय में व्याख्या हुई थी। यहाँ गुरु-शिष्य का विषय वर्णित करते हैं।