Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 670

1875 Mantra
Devata- इन्द्राग्नी Rishi- विश्वामित्रो गाथिनः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
इ꣡न्द्रा꣢ग्नी जरि꣣तुः꣡ सचा꣢꣯ य꣣ज्ञो꣡ जि꣢गाति꣣ चे꣡त꣢नः । अ꣣या꣡ पा꣢तमि꣣म꣢ꣳ सु꣣त꣢म् ॥६७०॥

इ꣡न्द्रा꣢꣯ग्नी । इ꣡न्द्र꣢꣯ । अ꣣ग्नीइ꣡ति꣢ । ज꣢रितुः꣣ । स꣡चा꣢꣯ । य꣣ज्ञः꣢ । जि꣢गाति । चे꣡तनः꣢꣯ । अ꣣या꣢ । पा꣣तम् । इम꣢म् । सु꣣त꣢म् ॥६७०॥

Mantra without Swara
इन्द्राग्नी जरितुः सचा यज्ञो जिगाति चेतनः । अया पातमिमꣳ सुतम् ॥

इन्द्राग्नी । इन्द्र । अग्नीइति । जरितुः । सचा । यज्ञः । जिगाति । चेतनः । अया । पातम् । इमम् । सुतम् ॥६७०॥

Samveda - Mantra Number : 670
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 2;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (इन्द्राग्नी) आत्मा और मन ! (जरितुः) विद्याओं का वर्णन करनेवाले उपदेष्टा आचार्य का (सचा) गुरु-शिष्यों द्वारा साथ मिलकर किया हुआ (चेतनः) चेतानेवाला (यज्ञः) विद्यायज्ञ (जिगाति) प्रवृत्त हो रहा है। तुम दोनों (अया) इस पद्धति से (सुतम्) निष्पादित (इमम्) इस विद्या-यज्ञ की (पातम्) रक्षा करते हो ॥२॥
Essence
गुरु-शिष्य आपस में मिलकर ही ज्ञान-यज्ञ का अनुष्ठान करके राष्ट्र में सब प्रकार की विद्याओं का प्रचार करते हैं ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में पुनः उसी विषय का वर्णन है।