Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 658

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- शतं वैखानसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣢च्छा꣣ को꣡शं꣢ मधु꣣श्चु꣢त꣣म꣡सृ꣢ग्रं꣣ वा꣡रे꣢ अ꣣व्य꣡ये꣢ । अ꣡वा꣢वशन्त धी꣣त꣡यः꣢ ॥६५८॥

अ꣡च्छ꣢꣯ । को꣡श꣢꣯म् । म꣣धुश्चु꣡त꣢म् । म꣣धु । श्चु꣡त꣢꣯म् । अ꣡सृ꣢꣯ग्रम् । वा꣡रे꣢꣯ । अ꣣व्य꣡ये꣣ । अ꣡वा꣢꣯वशन्त । धी꣣त꣡यः꣢ ॥६५८॥

Mantra without Swara
अच्छा कोशं मधुश्चुतमसृग्रं वारे अव्यये । अवावशन्त धीतयः ॥

अच्छ । कोशम् । मधुश्चुतम् । मधु । श्चुतम् । असृग्रम् । वारे । अव्यये । अवावशन्त । धीतयः ॥६५८॥

Samveda - Mantra Number : 658
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 1;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रथम—सोमौषधिरस के पक्ष में। मैं (मधुश्चुतम्) मधुस्रावी सोमरस को (कोशम् अच्छ) द्रोणकलश में पहुँचाने के लिए (अव्यवे वारे) भेड़ के बालों से बनी हुई छन्नी में (असृग्रम्) छोड़ता हूँ। मेरी (धीतयः) अंगुलियाँ (अवावशन्त) सोमरस को छानने में प्रवृत्त हो रही हैं। द्वितीय—ब्रह्मानन्द के पक्ष में। मैं (मधुश्चुतम्) माधुर्यस्रावी ब्रह्मानन्दरूप सोमरस को (कोशम् अच्छ) मन, बुद्धि एवं ज्ञानेन्द्रियरूप विज्ञानमय कोश में पहुँचाने के लिए (अव्यये वारे) अविनश्वर तथा कामक्रोधादि शत्रुओं का निवारण करनेवाले आत्मा में (असृग्रम्) छोड़ता हूँ। मेरी (धीतयः) स्तुतियाँ (अवावशन्त) प्रभु के गीतों का गान कर रही हैं ॥२॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥२॥
Essence
जैसे सोमौषधि का रस छन्नी के माध्यम से द्रोणकलश में प्रविष्ट कराया जाता है, वैसे ही ब्रह्मानन्दरस को आत्मा के माध्यम से सभी मन-बुद्धि आदियों में प्रविष्ट कराना चाहिए, जिससे हमारे दर्शन, श्रवण, मनन, निदिध्यासन आदि सब व्यवहार ब्रह्मानन्दमय हो जाएँ ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में पुनः सोमरस का विषय वर्णित है।