Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 656

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- कश्यपो मारीचः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ऋ꣣ध꣡क्सो꣢म स्व꣣स्त꣡ये꣢ संजग्मा꣣नो꣢ दि꣣वा꣡ क꣢वे । प꣡व꣢स्व꣣ सू꣡र्यो꣢ दृ꣣शे꣢ ॥६५६॥

ऋ꣣ध꣢क् । सो꣣म । स्व꣣स्त꣡ये꣢ । सु꣣ । अस्त꣡ये꣢ । सं꣣जग्मानः꣢ । स꣣म् । जग्मानः꣢ । दि꣣वा꣢ । क꣣वे । प꣡व꣢꣯स्व । सू꣡र्यः꣢꣯ । दृ꣣शे꣢ ॥६५६॥

Mantra without Swara
ऋधक्सोम स्वस्तये संजग्मानो दिवा कवे । पवस्व सूर्यो दृशे ॥

ऋधक् । सोम । स्वस्तये । सु । अस्तये । संजग्मानः । सम् । जग्मानः । दिवा । कवे । पवस्व । सूर्यः । दृशे ॥६५६॥

Samveda - Mantra Number : 656
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 1;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रथम—जीवात्मा के पक्ष में। हे (कवे) बुद्धिमान्, दूरदर्शी (सोम) चन्द्रमा के समान उन्नतिशील जीवात्मन् ! तू (दिवा) परमात्मा की ज्योति से (संजग्मानः) संयुक्त होता हुआ (स्वस्तये) उत्कृष्ट जीवन के लिए (ऋधक्) उन्नति प्राप्त कर। (सूर्यः) सूर्य के समान प्रकाशमान होकर (दृशे) मुक्ति का मार्ग देखने के लिए (पवस्व) प्रयत्न कर ॥ द्वितीय—चन्द्रमा के पक्ष में। हे (कवे) पृथिवी की परिक्रमा करनेवाले (सोम) चन्द्रमा ! तू (दिवा) सूर्य के प्रकाश से (संजग्मानः) संयुक्त होता हुआ (स्वस्तये) हमारे सुख के लिए (ऋधक्) एक-एक कला से प्रतिदिन बढ़ता चल। पूर्णिमा को (सूर्यः) सूर्य के समान सम्पूर्ण प्रभामण्डलवाला होकर (दृशे) हमारे देखने के लिए (पवस्व) भूमण्डल पर अपनी चांदनी को फैला ॥३॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। ‘सूर्यः’ अर्थात् ‘सूर्य के सदृश’ में लुप्तोपमा है। चन्द्रमा के पक्ष में जड़ वस्तु में चेतनवत् व्यवहार आलङ्कारिक है ॥३॥
Essence
जैसे सूर्य से चन्द्रमा प्रकाशित होता है, वैसे ही परमात्मारूप सूर्य से हम प्रकाशित होते हैं ॥३॥
Subject
अगले मन्त्र में जीवात्मा और चन्द्रमा का विषय वर्णित है।