Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 646

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- प्रजापतिः Chhand- विराडनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
ई꣢शे꣣ हि꣢ श꣣क्र꣢꣫स्तमू꣣त꣡ये꣢ हवामहे꣣ जे꣡ता꣢र꣣म꣡प꣢राजितम् । स꣡ नः꣢ स्व꣣र्ष꣢द꣣ति द्वि꣢षः꣣ क्र꣢तु꣣श्छ꣡न्द꣢ ऋ꣣तं꣢ बृ꣣ह꣢त् ॥६४६

ई꣡शे꣢꣯ । हि । श꣣क्रः꣢ । तम् । ऊ꣣त꣡ये꣢ । ह꣣वामहे । जे꣡ता꣢꣯रम् । अ꣡प꣢꣯राजितम् । अ । प꣣राजितम् । स꣢ । नः꣣ । स्वर्षत् । अ꣡ति꣢꣯ । द्वि꣡षः꣢꣯ । क्र꣡तुः꣢꣯ । छ꣡न्दः꣢꣯ । ऋ꣣तम् । बृ꣣ह꣢त् ॥६४६॥

Mantra without Swara
ईशे हि शक्रस्तमूतये हवामहे जेतारमपराजितम् । स नः स्वर्षदति द्विषः क्रतुश्छन्द ऋतं बृहत् ॥६४६

ईशे । हि । शक्रः । तम् । ऊतये । हवामहे । जेतारम् । अपराजितम् । अ । पराजितम् । स । नः । स्वर्षत् । अति । द्विषः । क्रतुः । छन्दः । ऋतम् । बृहत् ॥६४६॥

Samveda - Mantra Number : 646

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
(शक्रः) शक्तिशाली इन्द्र परमेश्वर (हि) निश्चय ही (ईशे) सकल जगत् का अधीश्वर है। (तम्) उसे, हम (ऊतये) रक्षा के लिए (हवामहे) पुकारते हैं। कैसे परमेश्वर को? (जेतारम्) जो सब वस्तुओं को जीत लेनेवाला है, तथा (अपराजितम्) जो स्वयं किसी से पराजित नहीं होता। (सः) वह परमेश्वर (नः) हमें (द्विषः) आन्तरिक तथा बाह्य शत्रु से (अति स्वर्षत्) पार करे। (ऋतुः) ज्ञान, कर्म, शिव संकल्प और यज्ञ, (छन्दः) गायत्री आदि छन्द, (ऋतम्) सत्य और (बृहत्) बृहत् नामक साम हमारे उपकारक हों ॥६॥ ‘त्वामिद्धि हवामहे’ (साम २३४) इस ऋचा पर गाया जानेवाला साम बृहत् साम कहलाता है ॥६॥
Essence
विजेता, अपराजित परमात्मा का आश्रय लेकर उसके उपासक भी विजयी तथा अपराजित हो जाते हैं ॥६॥
Subject
अगले मन्त्र में परमात्मा का आह्वान किया गया है।