Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 618

1875 Mantra
Devata- पुरुषः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः Kaand Name- आरण्यं काण्डम् Gaan- आरण्य गान
Mantra with Swara
त्रि꣣पा꣢दू꣣र्ध्व꣢꣫ उदै꣣त्पु꣡रु꣢षः꣣ पादो꣢ऽस्ये꣣हा꣡भ꣢व꣣त्पु꣡नः꣢ । त꣢था꣣ वि꣢ष्व꣣꣬ङ् व्य꣢꣯क्रामदशनानश꣣ने꣢ अ꣣भि꣢ ॥६१८॥

त्रि꣣पा꣢त् । त्रि꣣ । पा꣢त् । ऊ꣣र्ध्वः꣢ । उत् । ऐ꣣त् । पु꣡रु꣢꣯षः । पा꣡दः꣢꣯ । अ꣣स्य । इह꣢ । अ꣣भवत् । पु꣢न꣣रि꣡ति꣢ । त꣡था꣢꣯ । वि꣡ष्व꣢꣯ङ् । वि । स्व꣣ङ् । वि꣢ । अ꣣क्रामत् । अशनानशने꣢ । अ꣣शन । आनशने꣡इति꣢ । अ꣣भि꣢ ॥६१८॥

Mantra without Swara
त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुषः पादोऽस्येहाभवत्पुनः । तथा विष्वङ् व्यक्रामदशनानशने अभि ॥

त्रिपात् । त्रि । पात् । ऊर्ध्वः । उत् । ऐत् । पुरुषः । पादः । अस्य । इह । अभवत् । पुनरिति । तथा । विष्वङ् । वि । स्वङ् । वि । अक्रामत् । अशनानशने । अशन । आनशनेइति । अभि ॥६१८॥

Samveda - Mantra Number : 618
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 4;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
(त्रिपात्) तीन-चौथाई अंशवाला (पुरुषः) पूर्वोक्त परमेश्वर (ऊर्ध्वः उत् ऐत्) इस जगत् से ऊपर उठा हुआ है। (इह पुनः) इस जगत् में तो (अस्य) इस पूर्ण परमेश्वर का (पादः) एक-चतुर्थांश ही (अभवत्) विद्यमान है। (तथा) उसी प्रकार से अर्थात् एक-चतुर्थांश की ही व्याप्ति से (वि-स्वङ्) विविध पदार्थों में सम्यक् प्राप्त हुआ वह (अशनानशने अभि) चेतन-अचेतन को लक्ष्य करके (व्यक्रामत्) विविध रुप से चेष्टा कर रहा है, अर्थात् मनुष्य आदि प्राणियों तथा अग्नि, सूर्य, पवन, पर्वत, नदी आदि चेतन-अचेतन के यथायोग्य प्राणन आदि व्यापार को तथा स्थिति आदि व्यापार को कर रहा है ॥४॥
Essence
इस चेतन-अचेतन-रूप जगत् में जो महान् कर्तृत्व दृष्टिगोचर हो रहा है, उसमें परमेश्वर के सामर्थ्य का थोड़ा-सा अंश ही क्रियाशील है, परमेश्वर का वास्तविक सामर्थ्य और स्वरूप तो लोकातिक्रान्त है ॥४॥
Subject
अगले मन्त्र में पुनः उसी परमपुरुष का वर्णन है।