Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 610

1875 Mantra
Devata- विश्वे देवाः Rishi- ऋजिश्वा भारद्वाजः Chhand- जगती Swara- धैवतः Kaand Name- आरण्यं काण्डम् Gaan- आरण्य गान
Mantra with Swara
वि꣡श्वे꣢ दे꣣वा꣡ मम꣢꣯ शृण्वन्तु य꣣ज्ञ꣢मु꣣भे꣢꣯ रोद꣢꣯सी अ꣣पां꣢꣯ नपा꣢꣯च्च꣣ म꣡न्म꣢ । मा꣢ वो꣣ व꣡चा꣢ꣳसि परि꣣च꣡क्ष्या꣢णि वोचꣳ सु꣣म्ने꣢꣫ष्विद्वो꣣ अ꣡न्त꣢मा मदेम ॥६१०॥

वि꣡श्वे꣢꣯ । दे꣣वाः꣢ । म꣡म꣢꣯ । शृ꣣ण्वन्तु । यज्ञ꣢म् । उ꣣भे꣡इति꣢ । रो꣡द꣢꣯सी꣣इ꣡ति꣢ । अ꣣पा꣢म् । न꣡पा꣢꣯त् । च । मन्म꣢ । मा । वः꣣ । व꣡चाँ꣢꣯सि । प꣣रिच꣡क्ष्या꣢णि । प꣣रि । च꣡क्ष्या꣢꣯णि । वो꣣चम् । सुम्ने꣡षु꣢ । इत् । वः꣣ । अ꣡न्त꣢꣯माः । म꣣देम ॥६१०॥

Mantra without Swara
विश्वे देवा मम शृण्वन्तु यज्ञमुभे रोदसी अपां नपाच्च मन्म । मा वो वचाꣳसि परिचक्ष्याणि वोचꣳ सुम्नेष्विद्वो अन्तमा मदेम ॥

विश्वे । देवाः । मम । शृण्वन्तु । यज्ञम् । उभेइति । रोदसीइति । अपाम् । नपात् । च । मन्म । मा । वः । वचाँसि । परिचक्ष्याणि । परि । चक्ष्याणि । वोचम् । सुम्नेषु । इत् । वः । अन्तमाः । मदेम ॥६१०॥

Samveda - Mantra Number : 610
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 3;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रथम—अध्यात्म-पक्ष में। (विश्वे देवाः) ज्ञानप्रकाशक शरीरस्थ सब मन, बुद्धि, ज्ञानेन्द्रिय रूप देव, (उभे रोदसी) प्राण-अपान दोनों, (अपां नपात् च) और प्राणों को पतित न होने देनेवाला जीवात्मा तथा परमेश्वर (मम) मेरे (यज्ञम्) विषय और इन्द्रियों के संसर्ग से प्राप्त होनेवाले (मन्म) विज्ञान को (शृण्वन्तु) पूर्ण करें। हे शरीरस्थ देवो ! (वः) तुम्हारे लिए, मैं (परिचक्ष्याणि) निन्दनीय (वचांसि) वचनों को (मा वोचम्) न बोलूँ—‘अहो, मेरा मन कुण्ठित हो गया है, बुद्धि कुण्ठित हो गयी है, इन्द्रियाँ अशक्त हो गयी हैं’ इत्यादि प्रकार से निराशा भरे वचन न कहूँ, प्रत्युत तुम्हारी शक्ति का गुणगान करते हुए तुम्हारे पास से अधिकाधिक लाभ प्राप्त करूँ। हम सभी (वः) तुम्हारे (अन्तमाः) निकटतम होकर (सुम्नेषु) तुम्हारे दिये हुए सुखों में (मदेम) तृप्त होवें ॥ द्वितीय—राष्ट्र-पक्ष में (विश्वे देवाः) सब विद्वान् लोग, (उभे रोदसी) दोनों राज-परिषदें अर्थात् सभा और समिति (अपां नपात् च) और प्रजाओं का पतन न होने देनेवाला राजा (मम) मेरे (यज्ञम्) राष्ट्रयज्ञ- विषयक (मन्म) विचार को (शृण्वन्तु) सुनें। हे उक्त देवो ! (वः) तुम्हारे लिए, मैं (परिचक्ष्याणि) निन्दायोग्य (वचांसि) वचन (मा वोचम्) न बोलूँ। हम (वः) तुम्हारे (अन्तमाः) निकटतम रहते हुए (सुम्नेषु) तुम्हारे दिये हुए सुखों में (मदेम) आनन्दित रहें ॥९॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥९॥
Essence
मनुष्यों को चाहिए कि शरीरस्थ देव आत्मा, मन, बुद्धि, प्राण व इन्द्रियों की और राष्ट्रस्थ देव विद्वज्जन, राजमन्त्री, न्यायाधीश, राजा आदि की सहायता से सब प्रकार के उत्कर्ष को प्राप्त करें ॥९॥
Subject
अगले मन्त्र के देवता विश्वेदेवाः है। उनके प्रति कहा जा रहा है।