Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 608

1875 Mantra
Devata- रात्रिः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः Kaand Name- आरण्यं काण्डम् Gaan- आरण्य गान
Mantra with Swara
आ꣡ प्रागा꣢꣯द्भ꣣द्रा꣡ यु꣢व꣣ति꣡रह्नः꣢꣯ के꣣तू꣡न्त्समी꣢꣯र्त्सति । अ꣡भू꣢द्भ꣣द्रा꣡ नि꣣वे꣡श꣢नी꣣ वि꣡श्व꣢स्य꣣ ज꣡ग꣢तो꣣ रा꣡त्री꣢ ॥६०८

आ꣢ । प्र । आ । अ꣣गात् । भद्रा꣢ । यु꣣वतिः । अ꣡ह्नः꣢꣯ । अ । ह्नः꣣ । केतू꣢न् । सम् । ई꣣र्त्सति । अ꣡भू꣢꣯त् । भ꣣द्रा꣢ । नि꣣वे꣡श꣢नी । नि꣣ । वे꣡श꣢꣯नी । वि꣡श्व꣢꣯स्य । ज꣡ग꣢꣯तः । रा꣡त्री꣢꣯ ॥६०८॥

Mantra without Swara
आ प्रागाद्भद्रा युवतिरह्नः केतून्त्समीर्त्सति । अभूद्भद्रा निवेशनी विश्वस्य जगतो रात्री ॥६०८

आ । प्र । आ । अगात् । भद्रा । युवतिः । अह्नः । अ । ह्नः । केतून् । सम् । ईर्त्सति । अभूत् । भद्रा । निवेशनी । नि । वेशनी । विश्वस्य । जगतः । रात्री ॥६०८॥

Samveda - Mantra Number : 608
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 3;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रथम—रात्रि के पक्ष में। (भद्रा) सुखदायिनी (युवतिः) रात्रिरूप युवति (आ प्रागात्) भले प्रकार आयी है, (अह्नः) दिन की (केतून्) किरणों को (समीर्त्सति) समेट रही है। यह (रात्री) रात्रिरूप युवति (विश्वस्य) सम्पूर्ण (जगतः) संसार की (निवेशनी) विश्रामदायिनी और (भद्रा) कल्याणकारिणी (अभूत्) हुई है ॥ द्वितीय—योगनिद्रा के पक्ष में। (भद्रा) सुखदायिनी (युवतिः) योगनिद्रारूप युवति (आ प्रागात्) शीघ्र ही योगमार्ग में आयी है, (अह्नः) सांसारिक विषयभोग रूप दिन के (केतून्) प्रभावों को (समीर्त्सति) संकुचित कर रही है। यह (रात्री) समाधिदशा रूप योगनिद्रा (विश्वस्य) सम्पूर्ण (जगतः) क्रियामय मनोव्यापार को (निवेशनी) सुलानेवाली और इसीलिए (भद्रा) आनन्दजनक (अभूत्) हुई है ॥७॥ इस मन्त्र में रात्रि में युवतित्व के आरोप के कारण रूपकालङ्कार है। तात्पर्य यह है कि जैसे कोई युवति घर में इधर-उधर बिखरी हुई वस्तुओं को समेटती है और पति के लिए सुखदायिनी और विश्रामदायिनी होती है, वैसे ही यह रात्रि दिन में बिखरी किरणों को समेटती है और सबके लिए विश्रामदायिनी होती है ॥७॥
Essence
रात्रि के समान योगसमाधिरूप निद्रा योगियों के लिए भद्र, आह्लाददायक और विश्रामदायिनी होती है ॥७॥
Subject
अगले मन्त्र का रात्रि देवता है। रात्रिरूप युवति का वर्णन है।