Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 590

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- कुत्स आङ्गिरसः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः Kaand Name- आरण्यं काण्डम् Gaan- आरण्य गान
Mantra with Swara
त्व꣡या꣢ व꣣यं꣡ पव꣢꣯मानेन सोम꣣ भ꣡रे꣢ कृ꣣तं꣢꣯ वि꣢꣯ चिनुयाम꣣ श꣡श्व꣢त् । त꣡न्नो꣢ मि꣣त्रो꣡ वरु꣢णो मामहन्ता꣣म꣡दि꣢तिः꣣ सि꣡न्धुः꣢ पृ꣣थि꣢वी उ꣣त꣢ द्यौः ॥५९०॥

त्व꣡या꣢꣯ । व꣣य꣢म् । प꣡व꣢꣯मानेन । सो꣣म । भ꣡रे꣢꣯ । कृ꣣त꣢म् । वि । चि꣣नुयाम । श꣡श्व꣢꣯त् । तत् । नः꣣ । मित्रः꣢ । मि꣣ । त्रः꣢ । व꣡रु꣢꣯णः । मा꣣महन्ताम् । अ꣡दि꣢꣯तिः । अ । दि꣣तिः । सि꣡न्धुः꣢꣯ । पृ꣣थिवी꣢ । उ꣣त꣢ । द्यौः ॥५९०॥

Mantra without Swara
त्वया वयं पवमानेन सोम भरे कृतं वि चिनुयाम शश्वत् । तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदितिः सिन्धुः पृथिवी उत द्यौः ॥

त्वया । वयम् । पवमानेन । सोम । भरे । कृतम् । वि । चिनुयाम । शश्वत् । तत् । नः । मित्रः । मि । त्रः । वरुणः । मामहन्ताम् । अदितिः । अ । दितिः । सिन्धुः । पृथिवी । उत । द्यौः ॥५९०॥

Samveda - Mantra Number : 590
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 1;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (सोम) प्रेरक परमात्मन् ! (पवमानेन) पवित्रकर्ता (त्वया) तुझ सहायक के द्वारा (वयम्) हम शूरवीर लोग (भरे) जीवन-संग्राम में (शश्वत्) निरन्तर (कृतम्) कर्म को (वि चिनुयाम) विशेषरूप से चुनें। (तत्) इस कारण (मित्रः) वायु, (वरुणः) अग्नि, (अदितिः) उषा, (सिन्धुः) अन्तरिक्ष-समुद्र अथवा पार्थिव समुद्र, (पृथिवी) भूमि (उत) और (द्यौः) द्युलोक अथवा सूर्य (नः) हमें (मामहन्ताम्) सत्कार से बढ़ाएँ। अथवा—(मित्रः) प्राण, (वरुणः) अपान, (अदितिः) वाणी, (सिन्धुः) हृदय-समुद्र, (पृथिवी) शरीर (उत) और (द्यौः) प्रकाशयुक्त बुद्धि वा आत्मा (नः मामहन्ताम्) हमें बढ़ाएँ। अथवा—(मित्रः) ब्राह्मणवर्ण, (वरुणः) क्षत्रियवर्ण, (अदितिः) न पीड़ित की जाने योग्य नारी जाति, (समुद्रः) समुद्र के तुल्य धन का संचय करनेवाला वैश्यवर्ण, (पृथिवी) राष्ट्रभूमि (उत) और (द्यौः) यशोमयी राजसभा (नः मामहन्ताम्) हम प्रजाजनों को अतिशय समृद्ध करें ॥५॥
Essence
‘मेरे दाहिने हाथ में कर्म है, बाएँ हाथ में विजय रखी हुई है।’ अथ० ७।५०।८, इस सिद्धान्त के अनुसार संसार में जो कर्म को अपनाता है, वही विजय पाता है। इस कर्मयोग के मार्ग में परमेश्वर के अतिरिक्त अग्नि-वायु-सूर्य आदि बाह्य देव, प्राण-अपान-वाणी-मन आदि आन्तरिक देव और ब्राह्मण-क्षत्रिय आदि राष्ट्र के देव हमारे सहायक और प्रेरक बन सकते हैं ॥५॥
Subject
अगली ऋचा का देवता पवमान सोम है। उससे प्रार्थना की गयी है।