Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 588

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- आरण्यं काण्डम् Gaan- आरण्य गान
Mantra with Swara
य꣢स्ये꣣द꣢मा꣣ र꣢जो꣣यु꣡ज꣢स्तु꣣जे꣢꣫ जने꣣ व꣢न꣣꣬ꣳ स्वः꣢꣯ । इ꣡न्द्र꣢स्य꣣ र꣡न्त्यं꣢ बृ꣣ह꣢त् ॥५८८॥

य꣡स्य꣢꣯ । इ꣣द꣢म् । आ꣣ । र꣡जः꣢ । आ । र꣡जः꣢꣯ । यु꣡जः꣢ । तु꣣जे꣢ । ज꣡ने꣢꣯ । व꣡न꣢꣯म् । स्व३रि꣡ति꣢ । इ꣡न्द्र꣢꣯स्य । र꣡न्त्य꣢꣯म् । बृ꣣ह꣢त् ॥५८८॥

Mantra without Swara
यस्येदमा रजोयुजस्तुजे जने वनꣳ स्वः । इन्द्रस्य रन्त्यं बृहत् ॥

यस्य । इदम् । आ । रजः । आ । रजः । युजः । तुजे । जने । वनम् । स्व३रिति । इन्द्रस्य । रन्त्यम् । बृहत् ॥५८८॥

Samveda - Mantra Number : 588
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 1;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
(आरजः) लोकलोकान्तर पर्यन्त (युजः) सब पदार्थों से योग करनेवाले (यस्य) जिस परमेश्वर का (तुजे जने) शीघ्र कार्य करनेवाले कर्मयोगी मनुष्य को (वनम्) सेवनीय (स्वः) धन प्राप्त होता है, उस (इन्द्रस्य) परमेश्वर का (रन्त्यम्) रमणीय ऐश्वर्य (बृहत्) बहुत बड़ा है ॥३॥
Essence
संसार में जहाँ-तहाँ जो अनेक प्रकार का धन बिखरा पड़ा है, वह सब परमात्मा का ही है। पुरुषार्थी जन ही उसे प्राप्त करने के अधिकारी हैं ॥३॥
Subject
अगले मन्त्र में उस परमेश्वर के धन का वर्णन है।