Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 553

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- प्रजापतिर्वैश्वामित्रो वाच्यो वा Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
प्र꣡ सु꣢न्वा꣣ना꣡यास्यान्ध꣢꣯सो꣣ म꣢र्तो꣣ न꣡ व꣢ष्ट꣣ त꣡द्वचः꣢꣯ । अ꣢प꣣ श्वा꣡न꣢मरा꣣ध꣡स꣢ꣳ ह꣣ता꣢ म꣣खं꣡ न भृग꣢꣯वः ॥५५३॥

प्र꣢ । सु꣣न्वाना꣡य꣢ । अ꣡न्ध꣢꣯सः । म꣡र्तः꣢꣯ । न । व꣣ष्ट । त꣢त् । व꣡चः꣢꣯ । अ꣡प꣢꣯ । श्वा꣡न꣢꣯म् । अ꣣राध꣡स꣢म् । अ꣣ । राध꣡स꣢म् । ह꣣त꣢ । म꣣ख꣢म् । न । भृ꣡ग꣢꣯वः ॥५५३॥

Mantra without Swara
प्र सुन्वानायास्यान्धसो मर्तो न वष्ट तद्वचः । अप श्वानमराधसꣳ हता मखं न भृगवः ॥

प्र । सुन्वानाय । अन्धसः । मर्तः । न । वष्ट । तत् । वचः । अप । श्वानम् । अराधसम् । अ । राधसम् । हत । मखम् । न । भृगवः ॥५५३॥

Samveda - Mantra Number : 553
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 8;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
(अन्धसः) सोमरस के (सुन्वानाय) अभिषुत करनेवाले अर्थात् सोमयाग, समाजसेवा और प्रभुभक्ति करनेवाले जन के लिए, जो (मर्तः) मनुष्य (तत्) उस प्रशंसात्मक (वचः) वचन को (न प्र वष्ट) नहीं कहना चाहता, उस (अराधसम्) अयज्ञसेवी, असमाजसेवी और अप्रभुसेवी तथा (श्वानम्) श्वान के समान लोभी, अपना ही पेट भरनेवाले मनुष्य को (अपहत) दूर कर दो, (न) जैसे (भृगवः) तपस्वी लोग (मखम्) चंचलता को दूर करते हैं, अथवा (न) जैसे (भृगवः) तेजस्वी राजपुरुष (मखम्) मखासुर को अर्थात् यज्ञ का ढ़ोंग रचनेवाले को दण्डित करते हैं ॥९॥ ‘श्वानम्’ में साध्यवसानालक्षणामूलक अतिशयोक्ति अलङ्कार है। निरुक्त की पद्धति से ‘श्वानम्’ में लुप्तोपमा, अर्थोपमा या व्यङ्ग्योपमा है, जैसा कि निरुक्त (३।१८) में लुप्तोपमा के प्रसङ्ग में कहा है कि श्वा और काक निन्दा अर्थ में लुप्तोपमा के रुप में आते हैं। ‘मखं न भृगवः’ में उपमालङ्कार है ॥९॥
Essence
परमेश्वरद्रोही, यज्ञद्रोही, समाजद्रोही और श्वान के समान विषयलोभी जन को समाज से बहिष्कृत कर देना चाहिए ॥९॥ इस दशति में परमात्मारूप सोम तथा परमात्मजन्य ब्रह्मानन्द रस की प्राप्ति का उपाय वर्णित होने से इस दशति के विषय की पूर्व दशति के विषय के साथ संगति है ॥ षष्ठ प्रपाठक में द्वितीय अर्ध की प्रथम दशति समाप्त ॥ पञ्चम अध्याय में अष्टम खण्ड समाप्त ॥
Subject
अगले मन्त्र में कहा गया है कि कैसे मनुष्य को समाज से बहिष्कृत करना चाहिए।