Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 552

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अम्बरीषो वार्षागिर ऋजिष्वा भारद्वाजश्च Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
प꣢रि꣣ त्य꣡ꣳ ह꣢र्य꣣त꣡ꣳ हरिं꣢꣯ ब꣣भ्रुं꣡ पु꣢नन्ति꣣ वा꣡रे꣢ण । यो꣢ दे꣣वा꣢꣫न्विश्वा꣣ꣳ इ꣢꣫त्परि꣣ म꣡दे꣢न स꣣ह꣡ गच्छ꣢꣯ति ॥५५२॥

प꣡रि꣢꣯ । त्यम् । ह꣣र्यतम् । ह꣡रि꣢꣯म् । ब꣣भ्रु꣢म् । पु꣣नन्ति । वा꣡रे꣢꣯ण । यः । दे꣣वा꣢न् । वि꣡श्वा꣢꣯न् । इत् । प꣡रि꣢꣯ । म꣡दे꣢꣯न । स꣣ह꣢ । ग꣡च्छ꣢꣯ति ॥५५२॥

Mantra without Swara
परि त्यꣳ हर्यतꣳ हरिं बभ्रुं पुनन्ति वारेण । यो देवान्विश्वाꣳ इत्परि मदेन सह गच्छति ॥

परि । त्यम् । हर्यतम् । हरिम् । बभ्रुम् । पुनन्ति । वारेण । यः । देवान् । विश्वान् । इत् । परि । मदेन । सह । गच्छति ॥५५२॥

Samveda - Mantra Number : 552
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 8;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
योगसाधना करनेवाले लोग (त्यम्) उस (हर्यतम्) चाहने योग्य, (बभ्रुम्) शरीर के भरण-पोषणकर्ता (हरिम्) अपने आत्मा को (वारेण) दोष-निवारक यम, नियम आदि तथा ईश्वरप्रणिधान के द्वारा (पुनन्ति) शुद्ध करते हैं, (यः) जो आत्मा योगसिद्ध होने पर (मदेन सह) आनन्द के साथ (विश्वान् इत्) सभी (देवान्) प्राण, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार, इन्द्रिय आदियों को (परिगच्छति) व्याप्त कर लेता है ॥ सोम ओषधि का रस भी हरि कहलाता है। श्लेष से उसके पक्ष में भी अर्थयोजना करनी चाहिए। उस पक्ष में ‘बभ्रु’ का अर्थ होता है भूरे रंग का और ‘वार’ का अर्थ भेड़ के बालों से निर्मित दशापवित्र, जिससे सोमरस को छानकर शुद्ध करते हैं। वह सोमरस आनन्द देता हुआ सब पानकर्ताओं को प्राप्त होता है ॥८॥
Essence
असत्य, हिंसा, छल, कपट, संशय, प्रमाद, आलस्य, भ्रान्ति आदि दोषों से दूषित अपने आत्मा को योग के उपायों से शुद्ध करके ही मनुष्य ऐहिक और पारमार्थिक उत्कर्ष पाने योग्य होता है ॥८॥
Subject
अगले मन्त्र में जीवात्मा के शोधन का विषय वर्णित है।