Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 539

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- कण्वो घौरः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
अ꣢धि꣣ य꣡द꣢स्मिन्वा꣣जि꣡नी꣢व꣣ शु꣢भः꣣ स्प꣡र्ध꣢न्ते꣣ धि꣢यः꣣ सू꣢रे꣣ न꣡ विशः꣢꣯ । अ꣣पो꣡ वृ꣢णा꣣नः꣡ प꣢वते꣣ क꣡वी꣢यान्व्र꣣जं꣡ न प꣢꣯शु꣣व꣡र्ध꣢नाय꣣ म꣡न्म꣢ ॥५३९॥

अ꣡धि꣢꣯ । यत् । अ꣣स्मिन् । वाजि꣡नि꣢ । इ꣣व । शु꣡भः꣢꣯ । स्प꣡र्ध꣢꣯न्ते । धि꣡यः꣢꣯ । सू꣡रे꣢꣯ । न । वि꣡शः꣢꣯ । अ꣣पः꣢ । वृ꣣णानः꣢ । प꣣वते । क꣡वी꣢꣯यान् । व्र꣣ज꣢म् । न । प꣣शुव꣡र्ध꣢नाय । प꣣शु । व꣡र्ध꣢꣯नाय । म꣡न्म꣢꣯ ॥५३९॥

Mantra without Swara
अधि यदस्मिन्वाजिनीव शुभः स्पर्धन्ते धियः सूरे न विशः । अपो वृणानः पवते कवीयान्व्रजं न पशुवर्धनाय मन्म ॥

अधि । यत् । अस्मिन् । वाजिनि । इव । शुभः । स्पर्धन्ते । धियः । सूरे । न । विशः । अपः । वृणानः । पवते । कवीयान् । व्रजम् । न । पशुवर्धनाय । पशु । वर्धनाय । मन्म ॥५३९॥

Samveda - Mantra Number : 539
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 7;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
(यत्) जब (अस्मिन्) इस सोमनामक परमात्मा में (धियः) उपासक की ध्यानवृत्तियाँ (अधि स्पर्धन्ते) मानो मैं पहले प्रवेश करूँ-मैं पहले करूँ इस प्रकार स्पर्धा-सी करती हैं, किस प्रकार? (वाजिनि इव) जैसे घोड़े पर (शुभः) शोभाकारक अलङ्कार मानो उसे शोभित करने की स्पर्धा करते हैं, अथवा (वाजिनि इव) जैसे बलवान् पुरुष में (शुभः) शोभाकारी गुण निवास करने की स्पर्धा करते हैं, और (सूरे न) जैसे सूर्य में (विशः) उसकी प्रजाभूत किरणें व्याप्त होने की स्पर्धा करती हैं, तब (कवीयान्) अतिशय मेधावी सोम परमेश्वर (अपः) उपासक के प्राणों को (वृणानः) वरण करता हुआ, उसके (मन्म) मन को (पवते) पवित्र करता है, (न) जैसे, गोपालक मनुष्य (पशुवर्धनाय) गाय आदि पशुओं के पोषण के लिए (व्रजम्) गोशाला को स्वच्छ-पवित्र करता है ॥७॥ इस मन्त्र में ‘वाजिनीव शुभः’, ‘सूरे न विशः’, ‘व्रजं न पशुवर्धनाय’ ये तीन उपमाएँ हैं। चेतन के धर्म स्पर्धा का अलङ्कार, शुभगुण और ध्यानवृत्ति रूप अचेतनों के साथ योग में मानो स्पर्धा करते हैं यह अर्थ द्योतित होने से व्यङ्ग्योत्प्रेक्षा है ॥७॥
Essence
जब साधक लोग परमात्मा में ध्यान केन्द्रित करते हैं, तब परमात्मा उनके हृदयों को पवित्र करके उनकी सब प्रकार से वृद्धि करता है ॥७॥
Subject
अगले मन्त्र में सोम परमात्मा कब क्या करता है, इसका वर्णन है।