Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 538

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- नोधा गौतमः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
सा꣣कमु꣡क्षो꣢ मर्जयन्त꣣ स्व꣡सा꣢रो꣣ द꣢श꣣ धी꣡र꣢स्य धी꣣त꣢यो꣣ ध꣡नु꣢त्रीः । ह꣢रिः꣣ प꣡र्य꣢द्रव꣣ज्जाः꣡ सूर्य꣢꣯स्य꣣ द्रो꣡णं꣢ ननक्षे꣣ अ꣢त्यो꣣ न꣢ वा꣣जी꣢ ॥५३८॥

सा꣣कमु꣡क्षः꣢ । सा꣣कम् । उ꣡क्षः꣢꣯ । म꣣र्जयन्त । स्व꣡सा꣢꣯रः । द꣡श꣢꣯ । धी꣡र꣢꣯स्य । धी꣣त꣡यः꣢ । ध꣡नु꣢꣯त्रीः । ह꣡रिः꣢꣯ । प꣡रि꣢꣯ । अ꣣द्रवत् । जाः꣢ । सू꣡र्य꣢꣯स्य । सु । ऊ꣣र्यस्य । द्रो꣡णं꣢꣯ । न꣣नक्षे । अ꣡त्यः꣢꣯ । न । वा꣣जी꣢ ॥५३८॥

Mantra without Swara
साकमुक्षो मर्जयन्त स्वसारो दश धीरस्य धीतयो धनुत्रीः । हरिः पर्यद्रवज्जाः सूर्यस्य द्रोणं ननक्षे अत्यो न वाजी ॥

साकमुक्षः । साकम् । उक्षः । मर्जयन्त । स्वसारः । दश । धीरस्य । धीतयः । धनुत्रीः । हरिः । परि । अद्रवत् । जाः । सूर्यस्य । सु । ऊर्यस्य । द्रोणं । ननक्षे । अत्यः । न । वाजी ॥५३८॥

Samveda - Mantra Number : 538
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 7;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रथम—सोम ओषधि के पक्ष में। (धीरस्य) बुद्धिमान् यजमान के (साकमुक्षः) साथ मिलकर सोमरस को निचोड़नेवाली, (धनुत्रीः) प्रेरक, (दश) दस (धीतयः) अंगुलियाँ जब सोमरस को (मर्जयन्ति) शुद्ध करती हैं, तब (सूर्यस्य) सूर्य का (जाः) पुत्र (हरिः) हरे रंग का सोमरस (पर्यद्रवत्) चारों ओर फैल जाता है। (न) जैसे (वाजी) वेगवान् (अत्यः) घोड़ा (द्रोणम्) लकड़ी से बने रथ को (ननक्षे) व्याप्त करता है अर्थात् रथ में नियुक्त होता है, वैसे ही सोमरस (द्रोणम्) द्रोणकलश में (ननक्षे) व्याप्त होता है ॥ द्वितीय—परमात्मा के पक्ष में। (धीरस्य) ध्यान में स्थित योगी की (साकमुक्षः) साथ मिलकर ज्ञानों और कर्मों से सींचनेवाली, (स्वसारः) बहिनों के समान परस्पर सहायता करनेवाली, (धनुत्रीः) प्रेरक (दश) दस (धीतयः) यम-नियम-भावनाएँ, जब (मर्जयन्त) आत्मा को शुद्ध करती हैं, तब (सूर्यस्य) परमात्मा का (जाः) पुत्र (हरिः) उन्नति के मार्ग पर जानेवाला आत्मा (पर्यद्रवत्) क्रियाशील हो जाता है, और (न) जैसे (वाजी) वेगवान् (अत्यः) घोड़ा (द्रोणम्) लकड़ी से बने रथ को (ननक्षे) प्राप्त करता है, अर्थात् उसमें जुड़ता है, वैसे ही वह आत्मा (द्रोणम्) क्रियाशील परमात्मा-रूप द्रोणकलश को (ननक्षे) प्राप्त कर लेता है ॥६॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। ‘द्रोणं ननक्षे अत्यो न वाजी’ में श्लिष्टोपमा है। सकार-धकार-नकार तथा रेफ की अनेक बार आवृत्ति में वृत्त्यनुप्रास है ॥६॥
Essence
अंगुलियों से परिशुद्ध सोमरस जैसे द्रोणकलश को प्राप्त करता है, वैसे ही यम-नियम की भावनाओं से परिशुद्ध हुआ जीवात्मा परमात्मा को प्राप्त करता है ॥६॥
Subject
अगले मन्त्र में यह वर्णित है कि कब जीवात्मा परमात्मा को प्राप्त करता है।