Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 510

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अमहीयुराङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
अ꣣पघ्न꣡न्प꣢वते꣣ मृ꣢꣫धोऽप꣣ सो꣢मो꣣ अ꣡रा꣢व्णः । ग꣢च्छ꣣न्नि꣡न्द्र꣢स्य नि꣣ष्कृ꣢तम् ॥५१०॥

अ꣣पघ्न꣢न् । अ꣣प । घ्न꣢न् । प꣣वते । मृ꣡धः꣢꣯ । अ꣡प꣢꣯ । सो꣡मः꣢꣯ । अ꣡रा꣢꣯व्णः । अ । रा꣣व्णः । ग꣡च्छ꣢꣯न् । इ꣡न्द्र꣢꣯स्य । नि꣣ष्कृत꣢म् । निः꣣ । कृत꣢म् ॥५१०॥

Mantra without Swara
अपघ्नन्पवते मृधोऽप सोमो अराव्णः । गच्छन्निन्द्रस्य निष्कृतम् ॥

अपघ्नन् । अप । घ्नन् । पवते । मृधः । अप । सोमः । अराव्णः । अ । राव्णः । गच्छन् । इन्द्रस्य । निष्कृतम् । निः । कृतम् ॥५१०॥

Samveda - Mantra Number : 510
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 4;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
(सोमः) पवित्र रस का भण्डार परमेश्वर (इन्द्रस्य) जीवात्मा के (निष्कृतम्) संस्कृत किये हुए हृदयरूप घर में (गच्छन्) जाता हुआ, (मृधः) संग्रामकर्ता पापरूप शत्रुओं को (अपघ्नन्) विध्वस्त करता हुआ और (अराव्णः)अदानशील स्वार्थभावों को (अप) विनष्ट करता हुआ (पवते) पवित्रता प्रदान करता है ॥१४॥
Essence
जब पवित्रतादायक आनन्दरस की धारा को प्रवाहित करता हुआ सोम परमेश्वर साधक के हृदय में प्रकट होता है तब उसका हृदय सब वासनाओं से रहित और स्वार्थवृत्ति से विहीन होकर पवित्र हो जाता है ॥१४॥ इस दशति में सोम परमात्मा तथा उससे उत्पन्न होनेवाली आनन्दरसधारा का वर्णन होने से इस दशति के विषय की पूर्व दशति के विषय के साथ संगति है ॥ षष्ठ प्रपाठक में प्रथम अर्ध की द्वितीय दशति समाप्त ॥ पञ्चम अध्याय में चतुर्थ खण्ड समाप्त ॥
Subject
अगले मन्त्र में सोम परमात्मा का कर्म वर्णित है।