Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 509

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अयास्य आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
प्र꣡ न꣢ इन्दो म꣣हे꣡ तु न꣢꣯ ऊ꣣र्मिं꣡ न बिभ्र꣢꣯दर्षसि । अ꣣भि꣢ दे꣣वा꣢ꣳ अ꣣या꣡स्यः꣢ ॥५०९॥

प्र꣢ । नः꣣ । इन्दो । महे꣢ । तु । नः꣣ । ऊर्मि꣢म् । न । बि꣡भ्र꣢꣯त् । अ꣣र्षसि । अभि꣢ । दे꣣वा꣢न् । अ꣣या꣡स्यः꣢ ॥५०९॥

Mantra without Swara
प्र न इन्दो महे तु न ऊर्मिं न बिभ्रदर्षसि । अभि देवाꣳ अयास्यः ॥

प्र । नः । इन्दो । महे । तु । नः । ऊर्मिम् । न । बिभ्रत् । अर्षसि । अभि । देवान् । अयास्यः ॥५०९॥

Samveda - Mantra Number : 509
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 4;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (इन्दो) आनन्द-रस से आर्द्र करनेवाले रस के सागर परमात्मन् ! (अयास्यः) प्राणप्रिय तू (ऊर्मिं न) मानो लहर को (बिभ्रत्) धारण करता हुआ (नः) हमारी (महे) वृद्धि के लिए (तु) शीघ्र ही (देवान् नः अभि) हम विद्वान् उपासकों को लक्ष्य करके (अर्षसि) प्राप्त हो ॥१३॥ इस मन्त्र में ‘ऊर्मिं न बिभ्रत्’ में उत्प्रेक्षालङ्कार है ॥१३॥
Essence
उपासना किया गया प्राणप्रिय परमेश्वर अपने प्यारे उपासक को मानो आनन्द की तरङ्गों से आप्लावित कर देता है ॥१३॥
Subject
अगले मन्त्र में सोम परमात्मा का आह्वान किया गया है।