Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 483

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- निध्रुविः काश्यपः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
प꣡व꣢स्व दे꣣व꣡ आ꣢यु꣣ष꣡गिन्द्रं꣢꣯ गच्छतु ते꣣ म꣡दः꣢ । वा꣣यु꣡मा रो꣢꣯ह꣣ ध꣡र्म꣢णा ॥४८३॥

प꣡व꣢꣯स्व । दे꣣वः꣢ । आ꣣युष꣢क् । आ꣣यु । स꣢क् । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । गच्छतु । ते । म꣡दः꣢꣯ । वा꣣युम् । आ । रो꣣ह । ध꣡र्म꣢꣯णा ॥४८३॥

Mantra without Swara
पवस्व देव आयुषगिन्द्रं गच्छतु ते मदः । वायुमा रोह धर्मणा ॥

पवस्व । देवः । आयुषक् । आयु । सक् । इन्द्रम् । गच्छतु । ते । मदः । वायुम् । आ । रोह । धर्मणा ॥४८३॥

Samveda - Mantra Number : 483
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 2;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे पवमान सोम ! हे पवित्रताकारी रसागार परब्रह्म ! (देवः) दिव्यगुणवाले आप (आयुषक्) उपासक मनुष्यों में समवेत होकर (पवस्व) प्रस्रुत होवो, आनन्द-रस को प्रवाहित करो। (ते मदः) आपका आनन्द-रस (इन्द्रम्) आत्मा को (गच्छतु) प्राप्त हो। आप (धर्मणा) अपने धारक बल से (वायुम्) मेरे प्राण पर (आरोह) आरूढ़ होवो, अर्थात् मेरे प्राण भी आपकी तरङ्ग से तरङ्गित हों ॥७॥
Essence
परमात्मा-रूप सोम से झरा हुआ आनन्द-रस तभी प्रभावकारी होता है, जब वह आत्मा, प्राण आदि में पूर्णतः व्याप जाता है ॥७॥
Subject
अगले मन्त्र में परमात्मारूप सोम से प्रार्थना की गयी है।