Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 460

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- रेभः काश्यपः Chhand- अतिजगती Swara- निषादः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
त꣡मिन्द्रं꣢꣯ जोहवीमि म꣣घ꣡वा꣢नमु꣣ग्र꣢ꣳ स꣣त्रा꣡ दधा꣢꣯न꣣म꣡प्र꣢तिष्कुत꣣ꣳ श्र꣡वा꣢ꣳसि꣣ भू꣡रि꣢ । म꣡ꣳहि꣢ष्ठो गी꣣र्भि꣡रा च꣢꣯ य꣣ज्ञि꣡यो꣢ ववर्त्त रा꣣ये꣢ नो꣣ वि꣡श्वा꣢ सु꣣प꣡था꣢ कृणोतु व꣣ज्री꣢ ॥४६०॥

त꣢म् । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । जो꣣हवीमि । मघ꣡वा꣢नम् । उ꣣ग्र꣢म् । स꣣त्रा꣢ । द꣡धा꣢꣯नम् । अ꣡प्र꣢꣯तिष्कुतम् । अ । प्र꣣तिष्कुतम् । श्र꣡वाँ꣢꣯सि꣣ । भू꣡रि꣢꣯ । मँ꣡हि꣢꣯ष्ठः । गी꣣र्भिः꣢ । आ । च꣣ । यज्ञि꣡यः꣢ । व꣣वर्त । राये꣢ । नः꣣ । वि꣡श्वा꣢꣯ । सु꣣प꣡था꣢ । सु꣣ । प꣡था꣢꣯ । कृ꣣णोतु । वज्री꣢ ॥४६०॥

Mantra without Swara
तमिन्द्रं जोहवीमि मघवानमुग्रꣳ सत्रा दधानमप्रतिष्कुतꣳ श्रवाꣳसि भूरि । मꣳहिष्ठो गीर्भिरा च यज्ञियो ववर्त्त राये नो विश्वा सुपथा कृणोतु वज्री ॥

तम् । इन्द्रम् । जोहवीमि । मघवानम् । उग्रम् । सत्रा । दधानम् । अप्रतिष्कुतम् । अ । प्रतिष्कुतम् । श्रवाँसि । भूरि । मँहिष्ठः । गीर्भिः । आ । च । यज्ञियः । ववर्त । राये । नः । विश्वा । सुपथा । सु । पथा । कृणोतु । वज्री ॥४६०॥

Samveda - Mantra Number : 460
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 12;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
मैं (तम्) उस प्रसिद्ध (मघवानम्) ऐश्वर्यवान् (उग्रम्) अन्यायों और अन्यायियों के प्रति उग्र, (सत्रा दधानम्) सत्य को धारण करनेवाले, (अप्रतिष्कुतम्) शत्रुओं से प्रतिरुद्ध न होनेवाले (इन्द्रम्) परमात्मा, राजा वा आचार्य से (भूरि) अनेकानेक (श्रवांसि) यशों की (जोहवीमि) बार-बार याचना करता हूँ। (मंहिष्ठः) अतिशय दानी, (यज्ञियः) पूजा वा सत्कार के योग्य वह (गीर्भिः) उपदेशवाणियों के साथ (आ ववर्त) हमारे अभिमुख होवे। (वज्री) अविद्या-अन्याय आदि पर, हिंसा-असत्य-तस्करी आदि पर और हिंसकों पर वज्र उठानेवाला वह (राये) ऐश्वर्य के लिए (विश्वा नः) हम सबको (सुपथा) सुपथ से (कृणोतु) ले चले ॥४॥ इस मन्त्र में अर्थश्लेष अलङ्कार है ॥४॥
Essence
परमेश्वर, राजा और आचार्य जिन पर अनुग्रह करते हैं, वे सन्मार्ग पर चलनेवाले और यशस्वी होते हैं ॥४॥
Subject
अगले मन्त्र में परमात्मा, राजा और आचार्य को लक्ष्य करके कहा गया है।