Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 457

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- गृत्समदः शौनकः Chhand- अष्टिः Swara- मध्यमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
त्रि꣡क꣢द्रुकेषु महि꣣षो꣡ यवा꣢꣯शिरं तुविशु꣣ष्म꣢स्तृ꣣म्प꣡त्सोम꣢꣯मपिब꣣द्वि꣡ष्णु꣢ना सु꣣तं꣡ य꣢थाव꣣श꣢म् । स꣡ ईं꣢ ममाद꣣ म꣢हि꣣ क꣢र्म꣣ क꣡र्त्त꣢वे म꣣हा꣢मु꣣रु꣡ꣳ सैन꣢꣯ꣳ सश्चद्दे꣣वो꣢ दे꣣व꣢ꣳ स꣣त्य꣡ इन्दुः꣢꣯ स꣣त्य꣡मिन्द्र꣢꣯म् ॥४५७॥

त्रि꣡क꣢꣯द्रुकेषु । त्रि । क꣣द्रुकेषु । महिषः꣢ । य꣡वा꣢꣯शिरम् । य꣡व꣢꣯ । आ꣣शिरम् । तुविशुष्मः꣢ । तु꣣वि । शुष्मः꣢ । तृ꣣म्प꣢त् । सो꣡म꣢꣯म् । अ꣣पिबत् । वि꣡ष्णु꣢꣯ना । सु꣣त꣢म् । य꣣थावश꣢म् । य꣣था । वश꣢म् । सः । ई꣣म् । ममाद । म꣡हि꣢꣯ । क꣡र्म꣢꣯ । क꣡र्त्त꣢꣯वे । म꣣हा꣢म् । उ꣣रु꣢म् । स । ए꣣नम् । सश्चत् । देवः꣢ । दे꣣व꣢म् । स꣣त्यः꣢ । इ꣡न्दुः꣢꣯ । स꣣त्य꣢म् । इ꣡न्द्र꣢꣯म् ॥४५७॥

Mantra without Swara
त्रिकद्रुकेषु महिषो यवाशिरं तुविशुष्मस्तृम्पत्सोममपिबद्विष्णुना सुतं यथावशम् । स ईं ममाद महि कर्म कर्त्तवे महामुरुꣳ सैनꣳ सश्चद्देवो देवꣳ सत्य इन्दुः सत्यमिन्द्रम् ॥

त्रिकद्रुकेषु । त्रि । कद्रुकेषु । महिषः । यवाशिरम् । यव । आशिरम् । तुविशुष्मः । तुवि । शुष्मः । तृम्पत् । सोमम् । अपिबत् । विष्णुना । सुतम् । यथावशम् । यथा । वशम् । सः । ईम् । ममाद । महि । कर्म । कर्त्तवे । महाम् । उरुम् । स । एनम् । सश्चत् । देवः । देवम् । सत्यः । इन्दुः । सत्यम् । इन्द्रम् ॥४५७॥

Samveda - Mantra Number : 457
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 12;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रथम—सूर्य-चन्द्र के पक्ष में। (त्रिकद्रुकेषु) वायु, बिजली और बादल रूप तीन पदार्थों से युक्त अन्तरिक्षभागों में (महिषः) महान् (तुविशुष्मः) बहुत बलवान् सूर्यरूप इन्द्र (यवाशिरम्) संयुक्त-वियुक्त होनेवाली सूर्यकिरणों से पूर्णता को प्राप्त होनेवाले (सोमम्) चन्द्रमा को (तृम्पत्) तृप्ति प्रदान करता है, और चन्द्रमा (विष्णुना) उस व्याप्तिमान् सूर्य से (सुतम्) उत्पन्न किये किरणसमूह को (यथावशम्) यथेच्छ (अपिबत्) पान करता है। (सः) वह चन्द्रमा में प्रविष्ट सूर्यकिरणसमूह (ईम्) इस चन्द्रमा को (महि) महान् (कर्म) प्राण-प्रदान, चान्द्र मासों के निर्माण आदि कार्य (कर्तवे) करने के लिए (ममाद) हर्षित करता है। (सः) वह (देवः) प्रकाशमान (सत्यः) सत्य नियमवाला (इन्दुः) चन्द्रमा (एनम्) इस (देवम्) प्रकाशक (सत्यम्) सत्य नियमोंवाले (इन्द्रम्) सूर्य का (सश्चत्) सेवन करता रहता है ॥ द्वितीय—गुरु-शिष्य के पक्ष में। (त्रिकद्रुकेषु) ज्ञानकाण्ड, कर्मकाण्ड, उपासनाकाण्ड रूप तीन सवनोंवाले शिक्षायज्ञों में (महिषः) महान् (तुविशुष्मः) विद्यार्थी का अतिशय प्रतिभा-बल से युक्त आत्मा (तृम्पत्) तृप्ति लाभ करता हुआ (विष्णुना) व्याप्त विद्यावाले आचार्य से (सुतम्) अभिषुत, (यवाशिरम्) व्रतपालनरूप कर्मों से परिपक्व (सोमम्) ज्ञानरस को (यथावशम्) यथेच्छ (अपिबत्) पान करता है। (सः) पान किया हुआ वह ज्ञान-रस (महाम्) विद्या में महान् (उरुम्) विशाल हृष्टपुष्ट शरीरवाले (ईम्) विद्यार्थी के इस आत्मा को (महि) महान् (कर्म) समाजसुधार आदि कर्म (कर्तवे) करने के लिए (ममाद) हर्षित करता है। (देवः) दिव्यगुणयुक्त (सत्यः) सत्य (सः) वह (इन्दुः) विद्यारस (देवम्) दिव्य गुणवाले (सत्यम्) सत्यप्रिय (इन्द्रम्) आत्मा को (सश्चत्) निरन्तर प्राप्त होता रहता है ॥१॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। ‘देवो, देवं’ में छेकानुप्रास और ‘सत्य, सत्य’ में यमक है ॥१॥
Essence
विद्यार्थी का आत्मा गुरु के पास से ज्ञानरस का पान करके वैसे ही महान् कर्म करने योग्य हो जाता है, जैसे चन्द्रमा सूर्य के पास से प्रकाश का पान कर प्राणप्रदान आदि महान् कर्मों को करता है ॥१॥
Subject
प्रथम मन्त्र में सूर्य और चन्द्रमा के सम्बन्ध-वर्णन-पूर्वक गुरु के समीप से ज्ञानरसरूप सोम के पान का विषय है।