Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 455

1875 Mantra
Devata- विश्वेदेवाः Rishi- आत्रेयः Chhand- द्विपदा त्रिष्टुप् Swara- धैवतः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
ऊ꣣र्जा꣢ मि꣣त्रो꣡ वरु꣢꣯णः पिन्व꣣ते꣢डाः꣣ पी꣡व꣢री꣣मि꣡षं꣢ कृणु꣣ही꣡ न꣢ इन्द्र ॥४५५

ऊ꣣र्जा꣢ । मि꣣त्रः꣢ । मि꣣ । त्रः꣢ । व꣡रु꣢꣯णः । पि꣣न्वत । इ꣡डाः꣢꣯ । पी꣡व꣢꣯रीम् । इ꣡ष꣢꣯म् । कृ꣣णुहि꣢ । नः꣣ । इन्द्र ॥४५५॥

Mantra without Swara
ऊर्जा मित्रो वरुणः पिन्वतेडाः पीवरीमिषं कृणुही न इन्द्र ॥४५५

ऊर्जा । मित्रः । मि । त्रः । वरुणः । पिन्वत । इडाः । पीवरीम् । इषम् । कृणुहि । नः । इन्द्र ॥४५५॥

Samveda - Mantra Number : 455
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 11;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रथम—परमात्मा आदि के पक्ष में। हे (इन्द्र) परमैश्वर्यशाली परमात्मन् ! आप, (मित्रः) सूर्य और (वरुणः) वायु, मिलकर (ऊर्जा) रस से (इडाः) भूमियों को (पिन्वत) सींचो। हे इन्द्र परमात्मन् ! आप (नः) हमारे लिए (पीवरीम्) प्रचुर (इषम्) धान्य-सम्पत्ति को (कृणुहि) उत्पन्न करो, जिससे हम दुर्भिक्ष आदि से पीड़ित न हों ॥ द्वितीय—शरीर के पक्ष में। हे (इन्द्र) मेरे जीवात्मन् ! तू, (मित्रः) प्राण और (वरुणः) अपान मिलकर (ऊर्जा) बल के साथ (इडाः) मधुर वाणियों को (पिन्वत) प्रेरित करो। हे इन्द्र जीवात्मन् ! तू (नः) हमारे लिए (पीवरीम्) प्रचुर (इषम्) ज्ञान-सम्पदा को (कृणुहि) उत्पन्न कर ॥ तृतीय—राष्ट्र के पक्ष में। हे (इन्द्र) ऐश्वर्यवान् राजन् ! आप (मित्रः) राजमन्त्री और (वरुणः) सेनापति, मिलकर (ऊर्जा) अन्न के साथ (इडाः) भूमियों और गौओं को (पिन्वत) बहुतायत से प्रदान करो। हे इन्द्र राजन् ! आप (इषम्) प्रजा को (पीवरीम्) समृद्ध (कृणुहि) करो ॥९॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥९॥
Essence
परमात्मा, जीवात्मा और राजा मन, बुद्धि, प्राण, अपान, सूर्य, वायु, सचिव, सेनापति आदियों के साथ मिलकर भोज्य, पेय, बल, वाणी, भूमि, गाय आदि सम्पदाओं से हमें समृद्ध करें ॥९॥
Subject
अगले मन्त्र के देवता विश्वेदेवाः हैं। इसमें यह विषय है कि इन्द्र, मित्र और वरुण हमारे लिए क्या करें।