Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 442

1875 Mantra
Devata- विश्वेदेवाः Rishi- त्रसदस्युः Chhand- द्विपदा विराट् पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
स꣢दा꣣ गा꣢वः꣣ शु꣡च꣢यो वि꣣श्व꣡धा꣢यसः꣣ स꣡दा꣢ दे꣣वा꣡ अ꣢रे꣣प꣡सः꣢ ॥४४२

स꣡दा꣢꣯ । गा꣡वः꣢꣯ । शु꣡च꣢꣯यः । वि꣣श्व꣡धा꣢यसः । वि꣣श्व꣢ । धा꣣यसः । स꣡दा꣢꣯ । दे꣣वाः꣢ । अ꣣रेप꣡सः꣢ । अ꣣ । रेप꣡सः꣢ ॥४४२॥

Mantra without Swara
सदा गावः शुचयो विश्वधायसः सदा देवा अरेपसः ॥४४२

सदा । गावः । शुचयः । विश्वधायसः । विश्व । धायसः । सदा । देवाः । अरेपसः । अ । रेपसः ॥४४२॥

Samveda - Mantra Number : 442
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 10;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
(सदा) हमेशा (विश्वधायसः) सबको अपना रस पिलानेवाली (गावः) धेनुएँ, सूर्यकिरणें और वेदवाणियाँ (शुचयः) पवित्र और पवित्रताकारक होती हैं। (सदा) हमेशा (देवाः) दान करने, प्रकाशित होने, प्रकाशित करने आदि गुणवाले सदाचारी विद्वान् लोग (अरेपसः) निर्दोष एवं पवित्र होते हैं ॥६॥
Essence
सब स्त्री-पुरुषों को गौओं, सूर्यकिरणों, वेदवाणियों और विद्वानों के समान सदा निर्दोष और पवित्र रहना चाहिए ॥६॥
Subject
अगले मन्त्र में ‘विश्वेदेवाः’ देवता हैं। उनकी पवित्रता का वर्णन किया गया है।