Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 399

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- सौभरि: काण्व: Chhand- ककुप् Swara- ऋषभः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
अ꣣भ्रातृव्यो꣢ अ꣣ना꣡ त्वमना꣢꣯पिरिन्द्र ज꣣नु꣡षा꣢ स꣣ना꣡द꣢सि । यु꣣धे꣡दा꣢पि꣣त्व꣡मि꣢च्छसे ॥३९९॥

अ꣣भ्रातृव्यः꣢ । अ꣣ । भ्रातृव्यः꣢ । अ꣣ना꣢ । त्वम् । अ꣡ना꣢꣯पिः । अन् । आ꣣पिः । इन्द्र । जनु꣡षा꣢ । स꣣ना꣡त् । अ꣣सि । युधा꣢ । इत् । आ꣣पित्व꣢म् । इ꣣च्छसे ॥३९९॥

Mantra without Swara
अभ्रातृव्यो अना त्वमनापिरिन्द्र जनुषा सनादसि । युधेदापित्वमिच्छसे ॥

अभ्रातृव्यः । अ । भ्रातृव्यः । अना । त्वम् । अनापिः । अन् । आपिः । इन्द्र । जनुषा । सनात् । असि । युधा । इत् । आपित्वम् । इच्छसे ॥३९९॥

Samveda - Mantra Number : 399
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 6;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (इन्द्र) जगत् के उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय के कर्ता परमात्मन् ! तुम (सनात्) सनातन काल से (जनुषा) स्वभावतः (अभ्रातृव्यः) शत्रु-रहित, (अना) नेता-रहित और (अनापिः) अबन्धु (असि) हो। (युधा इत्) युद्ध से ही (आपित्वम्)बन्धुत्व को (इच्छसे) चाहते हो, अर्थात् जो आन्तरिक तथा बाह्य देवासुरसंग्रामों में विजयी होता है, उसी के तुम बन्धु होते हो ॥१॥ इस मन्त्र में अना, मना, सना में वृत्त्यनुप्रास अलङ्कार है। ‘त्वम, त्वमि’ में छेकानुप्रास है ॥१॥
Essence
जिससे शत्रुता ठानने का कोई साहस नहीं करता और जिसका नेतृत्व करनेवाला कोई नहीं है, वह महान् जगदीश्वर पुरुषार्थियों का ही बन्धु बनता है, अकर्मण्यों का नहीं ॥१॥
Subject
प्रथम मन्त्र में इन्द्र के शत्रु-रहित होने आदि का वर्णन है।