Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 394

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- पर्वतः काण्वः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
य꣡ इ꣢न्द्र सोम꣣पा꣡त꣢मो꣣ म꣡दः꣢ शविष्ठ꣣ चे꣡त꣢ति । ये꣢ना꣣ ह꣢ꣳसि न्या꣢꣯३꣱त्रिणं त꣡मी꣢महे ॥३९४॥

यः꣢ । इ꣣न्द्र । सोमपा꣡त꣢मः । सो꣣म । पा꣡त꣢꣯मः । म꣡दः꣢꣯ । श꣣विष्ठ । चे꣡त꣢꣯ति । ये꣡न꣢꣯ । हँ꣡सि꣢꣯ । नि । अ꣣त्रि꣡ण꣢म् । तम् । ई꣣महे ॥३९४॥

Mantra without Swara
य इन्द्र सोमपातमो मदः शविष्ठ चेतति । येना हꣳसि न्या३त्रिणं तमीमहे ॥

यः । इन्द्र । सोमपातमः । सोम । पातमः । मदः । शविष्ठ । चेतति । येन । हँसि । नि । अत्रिणम् । तम् । ईमहे ॥३९४॥

Samveda - Mantra Number : 394
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 5;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (शविष्ठ) बलिष्ठ (इन्द्र) शत्रुविदारक परमात्मन्, जीवात्मन् वा सेनाध्यक्ष ! (यः) जो आप (सोमपातमः) अतिशय वीररस का पान करनेवाले हो, उन आपका (मदः) वीरताजनित हर्ष (चेतति) सदा जागता रहता है। आप (येन) अपने जिस पराक्रम से (अत्रिणम्) भक्षक शत्रु को (निहंसि) निःशेष रूप से विनष्ट कर देते हो (तम्) उस पराक्रम की, हम भी आपसे (ईमहे) याचना करते हैं ॥४॥ इस मन्त्र में अर्थश्लेषालङ्कार है ॥४॥
Essence
जैसे वीर परमात्मा और जीवात्मा वीररस से उत्साहित होकर सब कामक्रोधादिरूप, विघ्नरूप और पापरूप भक्षक राक्षसों को विनष्ट कर देते हैं, उसी प्रकार राष्ट्र में वीर सेनापति सब आक्रान्ता रिपुओं को अपने पराक्रम से दण्डित करे। वैसा वीररस और पराक्रम सब प्रजाजनों को भी प्राप्त करना चाहिए ॥४॥
Subject
अगले मन्त्र में इन्द्र नाम से परमात्मा, जीवात्मा और सेनाध्यक्ष को सम्बोधित किया गया है।