Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 387

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- विश्वमना वैयश्वः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
ए꣢तो꣣ न्वि꣢न्द्र꣣ꣳ स्त꣡वा꣢म꣣ स꣡खा꣢यः꣣ स्तो꣢म्यं꣣ न꣡र꣢म् । कृ꣣ष्टी꣡र्यो विश्वा꣢꣯ अ꣣भ्य꣢꣫स्त्येक꣣ इ꣢त् ॥३८७॥

आ꣢ । इ꣣त । उ । नु꣢ । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । स्त꣡वा꣢꣯म । स꣡खा꣢꣯यः । स । खा꣣यः । स्तो꣡म्य꣢꣯म् । न꣡र꣢꣯म् । कृ꣣ष्टीः꣢ । यः । वि꣡श्वाः꣢꣯ । अ꣣भ्य꣡स्ति꣢ । अ꣣भि । अ꣡स्ति꣢꣯ । ए꣡कः꣢꣯ । इत् ॥३८७॥

Mantra without Swara
एतो न्विन्द्रꣳ स्तवाम सखायः स्तोम्यं नरम् । कृष्टीर्यो विश्वा अभ्यस्त्येक इत् ॥

आ । इत । उ । नु । इन्द्रम् । स्तवाम । सखायः । स । खायः । स्तोम्यम् । नरम् । कृष्टीः । यः । विश्वाः । अभ्यस्ति । अभि । अस्ति । एकः । इत् ॥३८७॥

Samveda - Mantra Number : 387
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 4;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (सखायः) मित्रो ! तुम (नु) शीघ्र ही (एत उ) आओ। हम-तुम मिलकर (स्तोम्यम्) स्तुति के योग्य, (नरम्) नेता, (इन्द्रम्) राजाधिराज परमेश्वर की (स्तवाम) उपासना करें, (यः) जो (एकः-इत्) अकेला ही (विश्वाः कृष्टीः) सब मानवी प्रजाओं से (अध्यस्ति) महिमा में अधिक है ॥७॥
Essence
जो अकेला होता हुआ भी करोड़ों-करोड़ों की संख्याओं में विद्यमान मनुष्यों से महिमा में अधिक है, उसी सकल ब्रह्माण्ड के अधीश्वर की सबको स्तुति और आराधना करनी चाहिए ॥७॥
Subject
अगले मन्त्र में सखाओं को इन्द्र परमेश्वर की स्तुति के लिए बुलाया जा रहा है।