Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 380

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- कुत्स आङ्गिरसः Chhand- जगती Swara- निषादः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
प्र꣢ म꣣न्दि꣡ने꣢ पितु꣣म꣡द꣢र्च꣣ता व꣢चो꣣ यः꣢ कृ꣣ष्ण꣡ग꣢र्भा नि꣣र꣡ह꣢न्नृ꣣जि꣡श्व꣢ना । अ꣣वस्य꣢वो꣣ वृ꣡ष꣢णं꣣ व꣡ज्र꣢दक्षिणं म꣣रु꣡त्व꣢न्तꣳ स꣣ख्या꣡य꣢ हुवेमहि ॥३८०॥

प्रं꣢ । म꣣न्दि꣡ने꣢ । पि꣣तुम꣢त् । अ꣣र्चत । व꣡चः꣢꣯ । यः । कृ꣣ष्ण꣡ग꣢र्भाः । कृ꣣ष्ण꣢ । ग꣣र्भाः । निर꣡ह꣢न् । निः꣣ । अ꣡ह꣢꣯न् । ऋ꣣जि꣡श्व꣢ना । अ꣣वस्य꣡वः꣢ । वृ꣡ष꣢꣯णम् । व꣡ज्र꣢꣯दक्षिणम् । व꣡ज्र꣢꣯ । द꣣क्षिणम् । मरु꣡त्व꣢न्तम् । स꣣ख्या꣡य꣢ । स꣣ । ख्या꣡य꣢꣯ । हु꣣वेमहि ॥३८०॥

Mantra without Swara
प्र मन्दिने पितुमदर्चता वचो यः कृष्णगर्भा निरहन्नृजिश्वना । अवस्यवो वृषणं वज्रदक्षिणं मरुत्वन्तꣳ सख्याय हुवेमहि ॥

प्रं । मन्दिने । पितुमत् । अर्चत । वचः । यः । कृष्णगर्भाः । कृष्ण । गर्भाः । निरहन् । निः । अहन् । ऋजिश्वना । अवस्यवः । वृषणम् । वज्रदक्षिणम् । वज्र । दक्षिणम् । मरुत्वन्तम् । सख्याय । स । ख्याय । हुवेमहि ॥३८०॥

Samveda - Mantra Number : 380
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 3;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रथम—परमात्मा के पक्ष में। हे मनुष्यो ! तुम (मन्दिने) आनन्दयुक्त तथा आनन्दप्रदाता इन्द्र जगदीश्वर के लिए (पितुमत्) श्रद्धारूप रस से युक्त (वचः) स्तुतिवचन को (प्र अर्चत) प्रेरित करो, (यः) जो जगदीश्वर (ऋजिश्वना) सीधी जानेवाली किरणों से युक्त सूर्य के द्वारा (कृष्णगर्भाः) अन्धकारपूर्ण रात्रियों को (निरहन्) नष्ट करता है। आओ, (अवस्यवः) रक्षा की कामनावाले हम-तुम (वृषणम्) बादल से वर्षा करनेवाले अथवा सुखों के वर्षक, (वज्रदक्षिणम्) न्यायदण्ड जिसके प्रताप को बढ़ानेवाला है ऐसे, (मरुत्वन्तम्) प्रशस्त प्राणोंवाले इन्द्र जगदीश्वर को (सख्याय) मित्रता के लिए (हुवेमहि) पुकारें ॥ द्वितीय—गुरु-शिष्य के पक्ष में। हे सहपाठियो ! तुम (मन्दिने) आनन्ददाता तथा विद्या के ऐश्वर्य से युक्त आचार्य के लिए (पितुमत्) उत्कृष्ट अन्न सहित (वचः) आदरपूर्ण प्रियवचन (प्र अर्चत) उच्चारण करो, (यः) जो आचार्य (ऋजिश्वना) सरल शिक्षापद्धति से (कृष्णगर्भाः) काला अज्ञान जिनके गर्भ में है, ऐसी अविद्या-रात्रियों को (निरहन्) नष्ट करता है। (अवस्यवः)विद्या की तृप्ति को चाहनेवाले हम-तुम (वृषणम्) सद्गुणों की वर्षा करनेवाले, (वज्रदक्षिणम्) कुपथ से हटानेवाला है विद्यादान जिसका ऐसे, और (मरुत्वन्तम्) विद्यायज्ञ के ऋत्विज् प्रशस्त विद्वान् अध्यापक जिसके पास हैं, ऐसे आचार्य को (सख्याय) मैत्री के लिए (हुवेमहि) स्वीकार करें ॥११॥ इस मन्त्र में श्लेष अलङ्कार है ॥११॥
Essence
अहो, परमेश्वर हमारे प्रति कैसी मित्रता का निर्वाह करता है ! सर्वत्र व्याप्त हुई रात्रि के अन्धकार को निवारण करने और वर्षा करने में क्या हम जैसों का सामर्थ्य हो सकता है? वही हमारे उपकार के लिए इस प्रकार के विविध कर्मों को विना हमसे कोई शुल्क लिये कर रहा है। गुरु का भी हमारे प्रति कैसा महान् उपकार है, जो समस्त अविद्या-रात्रि को हटाकर ज्ञान की वर्षा से हमारी अन्तःकरण की भूमि को सरस करता है। इसलिए परमेश्वर और गुरु का हमें सर्वात्मना पूजन और सत्कार करना चाहिए ॥११॥ इस मन्त्र पर भरतस्वामी ने यह इतिहास लिखा है कि यह गर्भस्राविणी उपनिषद् है। कृष्ण नाम का एक असुर था, उस कृष्ण से गर्भवती हुई उसकी भार्याओं को इन्द्र ने गर्भ नष्ट करने के लिए मार डाला था। ऋजिश्वा नामक राजर्षि कृष्णासुर का शत्रु था, उसके हितार्थ ही इन्द्र ने कृष्णासुर का भी वध कर दिया और उसके पुत्र भी उत्पन्न न हों, इस हेतु से उसकी गर्भवती भार्याओं का भी वध कर दिया। सायण ने भी अपने भाष्य में ऐसा ही इतिहास लिखा है। किन्तु यह कल्पना का विलासमात्र है, इसमें वास्तविकता कुछ नहीं है। सत्यव्रत सामश्रमी ने सायण की व्याख्या को अरुचिकर मानते हुए टिप्पणी दी है कि—यहाँ विवरणकार का व्याख्यान अधिक उत्कृष्ट है, जिसने आधिदैविक अर्थ करते हुए लिखा है कि ‘कृष्णगर्भाः’ का तात्पर्य है काले मेघ में गर्भरूप से रहनेवाले जल, जिन्हें इन्द्र उनमें से निकालकर बरसा देता है। ‘निरहन्’ में हन् धातु अन्तर्णीतण्यर्थ है, जिसका अर्थ निकालना या नीचे गिरा देना है’’ ॥ इस दशति में इन्द्र की महिमा वर्णित होने, उसके स्तोत्र गाने के लिए प्रेरणा होने, द्यावापृथिवी के भी उसी के धर्म से धृत होने तथा इन्द्र नाम से राजा के भी कर्तव्य का वर्णन होने से इस दशति के विषय की पूर्व दशति के विषय के साथ संगति है ॥ चतुर्थ प्रपाठक में द्वितीय अर्ध की चतुर्थ दशति समाप्त ॥ चतुर्थ अध्याय में तृतीय खण्ड समाप्त ॥
Subject
अगले मन्त्र में परमात्मा और आचार्य के गुण-कर्मों का वर्णन किया गया है।