Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 38

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
त्वे꣡ अ꣢ग्ने स्वाहुत प्रि꣣या꣡सः꣢ सन्तु सू꣣र꣡यः꣢ । य꣣न्ता꣢रो꣣ ये꣢ म꣣घ꣡वा꣢नो꣣ ज꣡ना꣢नामू꣣र्वं꣡ दय꣢꣯न्त꣣ गो꣡ना꣢म् ॥३८॥

त्वे꣣ इति꣢ । अ꣣ग्ने । स्वाहुत । सु । आहुत । प्रिया꣡सः꣢ । स꣣न्तु । सूर꣡यः꣢ । य꣣न्ता꣡रः꣢ । ये । म꣣घ꣡वा꣢नः । ज꣡ना꣢꣯नाम् । ऊ꣣र्व꣢म् । दय꣢꣯न्त । गो꣡ना꣢꣯म् ॥३८॥

Mantra without Swara
त्वे अग्ने स्वाहुत प्रियासः सन्तु सूरयः । यन्तारो ये मघवानो जनानामूर्वं दयन्त गोनाम् ॥

त्वे इति । अग्ने । स्वाहुत । सु । आहुत । प्रियासः । सन्तु । सूरयः । यन्तारः । ये । मघवानः । जनानाम् । ऊर्वम् । दयन्त । गोनाम् ॥३८॥

Samveda - Mantra Number : 38
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 4;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (स्वाहुत) श्रद्धारसों की हवियों से सम्यक् आहुतिप्राप्त (अग्ने) तेजोमय परमात्मन् ! आपके (सूरयः) स्तोता विद्वान् जन (त्वे) आपकी दृष्टि में (प्रियासः) प्रिय (सन्तु) होवें, (मघवानः) लौकिक एवं आध्यात्मिक धनों से सम्पन्न (ये) जो (जनानाम्) मनुष्यों के (यन्तारः) शुभ एवं अशुभ कर्मों में नियन्त्रणकर्ता होते हुए (गोनाम्) चक्षु आदि इन्द्रियों के (ऊर्वम्) हिंसक दोष को (दयन्त) नष्ट करते हैं, अथवा (गोनाम्) वेदवाणियों के (ऊर्वम्) समूह को (दयन्त) अन्यों को प्रदान करते हैं; अथवा (गोनाम्) गायों की (ऊर्वम्) गोशाला की (दयन्त) रक्षा करते हैं ॥४॥
Essence
जो विद्वान् श्रद्धालु लौकिक और आध्यात्मिक सब प्रकार के धन को उपार्जित कर, योग्य होकर, लोगों का नियन्त्रण करते हैं, अपने और दूसरों के इन्द्रिय-दोषों को दूर करते हैं, वेद-वाणियों का प्रसार करते हैं और अमृत प्रदान करनेवाली गायों की रक्षा करते हैं, वे ही परमात्मा के प्रिय होते हैं ॥४॥
Subject
कौन लोग परमात्मा के प्रिय हों, यह कहते हैं।