Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 344

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
इ꣣म꣡मि꣢न्द्र सु꣣तं꣡ पि꣢ब꣣ ज्ये꣢ष्ठ꣣म꣡म꣢र्त्यं꣣ म꣡द꣢म् । शु꣣क्र꣡स्य꣢ त्वा꣣꣬भ्य꣢꣯क्षर꣣न्धा꣡रा꣢ ऋ꣣त꣢स्य꣣ सा꣡द꣢ने ॥३४४॥

इ꣣म꣢म् । इ꣣न्द्र । सुत꣢म् । पि꣣ब । ज्ये꣡ष्ठ꣢꣯म् । अ꣡म꣢꣯र्त्यम् । अ । म꣣र्त्यम् । म꣡द꣢꣯म् । शु꣣क्र꣡स्य꣢ । त्वा꣣ । अभि꣢ । अ꣣क्षरन् । धा꣡राः꣢꣯ । ऋ꣣त꣡स्य꣢ । सा꣡द꣢꣯ने ॥३४४॥

Mantra without Swara
इममिन्द्र सुतं पिब ज्येष्ठममर्त्यं मदम् । शुक्रस्य त्वाभ्यक्षरन्धारा ऋतस्य सादने ॥

इमम् । इन्द्र । सुतम् । पिब । ज्येष्ठम् । अमर्त्यम् । अ । मर्त्यम् । मदम् । शुक्रस्य । त्वा । अभि । अक्षरन् । धाराः । ऋतस्य । सादने ॥३४४॥

Samveda - Mantra Number : 344
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 12;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रथम—परमात्मा के पक्ष में। हे (इन्द्र) अध्यात्मसम्पत्ति के प्रदाता परमैश्वर्यवन् परमात्मन् ! तुम (इमम्) इस (ज्येष्ठम्) अतिशय प्रशंसनीय, (अमर्त्यम्) दिव्य, (मदम्) स्तोता को आनन्द देनेवाले (सुतम्) तैयार किये हुए हमारे श्रद्धारसरूप सोम का (पिब) पान करो। (ऋतस्य) ध्यान-यज्ञ के (सादने) सदनभूत हृदय में (शुक्रस्य) दीप्त, पवित्र श्रद्धारस की (धाराः) धाराएँ (त्वा अभि) तुम्हारे प्रति (अक्षरन्) बह रही हैं ॥ द्वितीय—गुरु-शिष्य पक्ष में। शिष्य के प्रति यह आचार्य की उक्ति है। हे (इन्द्र) जिज्ञासु एवं विद्युत् के समान तीव्रबुद्धिवाले मेरे शिष्य ! तू (इमम्) मेरे द्वारा दिये जाते हुए इस (ज्येष्ठम्) श्रेष्ठ (अमर्त्यम्) चिर-स्थायी, (मदम्) तृप्तिप्रद, (सुतम्) अध्ययन-अध्यापन-विधि से निष्पादित ज्ञानरस को (पिब) पान कर, जिस ज्ञानरस को (शुक्रस्य) पवित्र (ऋतस्य) अध्ययन-अध्यापन-रूप यज्ञ के (सादने) सदन में, अर्थात् गुरूकुल में (धाराः) मेरी वाणियाँ (त्वा अभि) तेरे प्रति (अक्षरन्) सींच रही हैं ॥३॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥३॥
Essence
सब लोग दुःखविदारक, आनन्द के सिन्धु परमेश्वर के प्रति श्रद्धा को हृदय में धारण कर उसकी उपासना करें और गुरुजन शिष्यों के प्रति प्रेम से प्रभावी शिक्षा-पद्धति द्वारा विद्या प्रदान करें ॥३॥
Subject
अगले मन्त्र में यह विषय है कि इन्द्र सोमरस का पान करे।