Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 341

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
को꣢ अ꣣द्य꣡ यु꣢ङ्क्ते धु꣣रि꣢꣫ गा ऋ꣣त꣢स्य꣣ शि꣡मी꣢वतो भा꣣मि꣡नो꣢ दुर्हृणा꣣यू꣢न् । आ꣣स꣡न्ने꣢षामप्सु꣣वा꣡हो꣢ मयो꣣भू꣡न्य ए꣢꣯षां भृ꣣त्या꣢मृ꣣ण꣢ध꣣त्स꣡ जी꣢वात् ॥३४१॥

कः꣢ । अ꣣द्य꣢ । अ꣣ । द्य꣢ । यु꣣ङ्क्ते । धुरि꣢ । गाः । ऋ꣣त꣡स्य꣢ । शि꣡मी꣢꣯वतः । भा꣣मि꣡नः꣢ । दु꣣र्हृणायू꣢न् । दुः꣣ । हृणायू꣢न् । आ꣣स꣢न् । ए꣣षाम् । अप्सुवा꣡हः꣢ । अ꣣प्सु । वा꣡हः꣢꣯ । म꣣योभू꣢न् । म꣣यः । भू꣢न् । यः । ए꣣षाम् । भृत्या꣢म् । ऋ꣣ण꣡ध꣢त् । सः । जी꣣वात् ॥३४१॥

Mantra without Swara
को अद्य युङ्क्ते धुरि गा ऋतस्य शिमीवतो भामिनो दुर्हृणायून् । आसन्नेषामप्सुवाहो मयोभून्य एषां भृत्यामृणधत्स जीवात् ॥

कः । अद्य । अ । द्य । युङ्क्ते । धुरि । गाः । ऋतस्य । शिमीवतः । भामिनः । दुर्हृणायून् । दुः । हृणायून् । आसन् । एषाम् । अप्सुवाहः । अप्सु । वाहः । मयोभून् । मयः । भून् । यः । एषाम् । भृत्याम् । ऋणधत् । सः । जीवात् ॥३४१॥

Samveda - Mantra Number : 341
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 11;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
प्रथम—अध्यात्म पक्ष में। (कः) कौन मनुष्य (अद्य) आज (शिमीवतः) कर्मवान्, आलस्यरहित, (भामिनः) तेजस्वी, (दुर्हृणायून्) दुष्पराजेय, (अप्सुवाहः) नदी की धाराओं के सदृश बाधाओं के बीच से भी वहन कर ले जानेवाले, (मयोभून्) सुखप्रापक (गाः) ज्ञानेन्द्रिय-कर्मेन्द्रिय-प्राण-मन-बुद्धि रूप बैलों को (ऋतस्य) सत्यरूप रथ के (धुरि) धुरे में (युङ्क्ते) जोड़ेगा। (एषाम्) गतिशील (एषाम्) इन पूर्वोक्त इन्द्रियादिरूप बैलों के (आसन्) मुख में (यः) जो मनुष्य (भृत्याम्) उन-उनके उत्कृष्ट ग्राह्यविषयरूप जीविकाद्रव्य को (ऋणधत्) वृद्धि के साथ प्रदान करेगा, (सः) वह (जीवात्) प्रशस्त जीवन से युक्त होगा ॥ यहाँ ‘सत्य के धुरे में’ इस कथन से सत्य में रथ का आरोप ध्वनित होता है। सत्य के धुरे में सामान्य बैल क्योंकि नहीं जोड़े जा सकते, अतः आरोप के विषय बैलों में आरोप्यमाण इन्द्रियादि गृहीत होते हैं। इन्द्रियादि में बैलों का आरोप होने से ही उनके मुख की भी कल्पना कर ली गयी है। अतिशयोक्ति अलङ्कार है ॥ द्वितीय—राष्ट्र के पक्ष में। (कः) कौन मनुष्य (अद्य) आज, संकट के समय (शिमीवतः) कर्मशूर, (भामिनः) क्षात्र तेज से युक्त, (दुर्हृणायून्) दुष्पराजेय, (अप्सुवाहः) युद्धयात्रा में नदी, समुद्र आदि के जलों में युद्धपोत को खेकर ले जानेवाले, (मयोभून्) शत्रुओं को जीतकर राष्ट्रवासियों को सुख देनेवाले (गाः) गतिशील सैनिकों को (ऋतस्य) राष्ट्ररूप यज्ञ के (धुरि) रक्षा के धुरे में (युङ्क्ते) नियुक्त करेगा? राजा ही नियुक्त करेगा, यह अभिप्राय है। (आसन्नेषाम्) जिनके तरकस में बाण हैं अर्थात् जिन्होंने प्रचुर शस्त्रास्त्रों का संचय किया हुआ है, ऐसे (एषाम्) इन सैनिकों के (यः) जो राजा (भृत्याम्) वेतन को (ऋणधत्) समय-समय पर बढ़ायेगा (सः) वह राजा (जीवात्) शत्रु-विजय करके प्रजाओं के साथ चिरकाल तक जीवित रहेगा ॥१०॥ इस मन्त्र में अध्यात्म और अधिराष्ट्र उभयविध अर्थ वाच्य होने से श्लेषालङ्कार है ॥१०॥
Essence
सत्य के ज्ञानार्थ तथा प्रचारार्थ आत्मा, मन, बुद्धि, प्राण एवं इन्द्रियों का यथोचित उपयोग मनुष्यों को करना चाहिए, और राष्ट्र के शासक राजा को चाहिए कि राष्ट्र के रक्षक सैनिकों का भरपूर वेतन-प्रदान आदि से सत्कार करे ॥१०॥ इस दशति में तार्क्ष्य नाम से परमेश्वर का स्मरण करने, इन्द्र-पर्वत के युगल की स्तुतिपूर्वक इन्द्र का स्तवन करने, उसके सख्य की याचना करने, इन्द्रिय-रूप गौओं का महत्त्व वर्णन करने तथा राजा, सैनिक आदि अर्थों के भी सूचित होने से इस दशति के विषय की पूर्व दशति के विषय के साथ संगति है ॥ चतुर्थ प्रपाठक में प्रथम अर्ध की पाँचवीं दशति समाप्त ॥ चतुर्थ प्रपाठक का प्रथम अर्ध समाप्त ॥ तृतीय अध्याय में ग्यारहवाँ खण्ड समाप्त ॥
Subject
इन्द्र देवतावाले भी अगले मन्त्र में इन्द्र को क्योंकि सत्य प्रिय है, अतः सत्य का विषय वर्णित है।