Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

Samveda Mantra 305

1875 Mantra
Devata- अश्विनौ Rishi- अश्विनौ वैवस्वतौ Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
कु꣢ष्ठः꣣ को꣡ वा꣢मश्विना तपा꣣नो꣡ दे꣢वा꣣ म꣡र्त्यः꣢ । घ्न꣣ता꣡ वा꣢मश्न꣣या꣡ क्षप꣢꣯माणो꣣ꣳशु꣢ने꣣त्थ꣢मु꣣ आ꣢द्व꣣न्य꣡था꣢ ॥३०५

कु꣢ । स्थः꣣ । कः꣢ । वा꣣म् । अश्विना । तपानः꣢ । दे꣢वा । म꣡र्त्यः꣢꣯ । घ्न꣣ता꣢ । वा꣣म् । अश्नया꣢ । क्ष꣡प꣢꣯माणः । अं꣣ऽशु꣡ना꣢ । इ꣣त्थ꣢म् । उ꣣ । आ꣢त् । उ꣣ । अन्य꣡था꣢ । अ꣣न् । य꣡था꣢꣯ ॥३०५॥

Mantra without Swara
कुष्ठः को वामश्विना तपानो देवा मर्त्यः । घ्नता वामश्नया क्षपमाणोꣳशुनेत्थमु आद्वन्यथा ॥३०५

कु । स्थः । कः । वाम् । अश्विना । तपानः । देवा । मर्त्यः । घ्नता । वाम् । अश्नया । क्षपमाणः । अंऽशुना । इत्थम् । उ । आत् । उ । अन्यथा । अन् । यथा ॥३०५॥

Samveda - Mantra Number : 305
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 8;

Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar)

हिन्दी
Samveda Bhashya (Acharya Ramnath Vedalankar) - हिन्दी
Meaning
हे (देवा) दानादि गुणों से युक्त, तेज से प्रकाशमान (अश्विना) परमात्मा-जीवात्मा और अध्यापक-उपदेशको ! (युवाम्) तुम (कु) कहाँ (स्थः) हो? (कः मर्त्यः) कौन मनुष्य (वाम्) तुम्हें (तपानः) संतप्त करनेवाला है? तुम कहाँ हो? प्रेरणा, शिक्षण या उपदेश क्यों नहीं करते हो? क्या रुष्ट हो? तुम्हारे रोष का क्या कारण है? आगे स्वयं ही उत्तर देता है—प्रथम—परमात्मा-जीवात्मा के पक्ष में—(अश्नया) मन में व्याप्त, (वाम् घ्नता) तुम्हारे पास पहुँचनेवाले (अंशुना) ज्ञान-कर्म-श्रद्धारूप सोमरस से (क्षपमाणः) तुम्हें वंचित करनेवाला ही तुम्हारा संतापक है । द्वितीय—अध्यापक-उपदेशक के पक्ष में। (अश्नया) भूख से (घ्नता) पीड़ित (वाम्) तुम्हें (अंशुना) भोजन, वस्त्र, वेतन आदि देयांश से (क्षपमाणः) वंचित करनेवाला ही तुम्हारा संतापक है। आगे अभयपक्ष में—(इत्थम् उ) ऐसा ही है न? (आत् उ) अथवा (अन्यथा) इससे भिन्न अन्य ही कोई तुम्हारे संताप और रोष का कारण है? अभिप्राय यह है कि अन्य कोई कारण नहीं हो सकता ॥३॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है ॥३॥
Essence
परमात्मा और जीवात्मा रूप अश्वी सदा मनुष्यों के हृदय में बैठे हुए हैं। जो ज्ञान, कर्म, श्रद्धा, भक्ति आदि का सोमरस यथायोग्य उन्हें अर्पित करता है, उसे वे सदा सत्प्रेरणा देते रहते हैं। पर जो उनकी उपेक्षा करता है उससे वे रुष्ट के समान हो जाते हैं। उसी प्रकार जो शिक्षण और उपदेशों से उपकार करनेवाले अध्यापक और उपदेशक को दक्षिणारूप में भोजन-वस्त्र आदि अथवा निश्चित वेतन नहीं देता, वह उनके प्रति अपराध करता है ॥३॥
Subject
अगले मन्त्र में यह बताया है कि किस कारण से उक्त अश्वी तप्त या रुष्ट होते हैं।